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“यूरिया महंगा, खेती और बेहाल!” आर्थिक सर्वे 2025-26 पर भाकियू का तीखा हमला, बोले नरेश चौधरी—‘पहले बोझ, फिर प्रोत्साहन का झांसा’

“खेती सुधरेगी या किसान टूटेगा?” यूरिया महंगा करने की तैयारी पर भाकियू का सरकार पर करारा वार, आर्थिक सर्वे पर उठे बड़े सवाल 

अमरोहा, 29 जनवरी। रिपोर्ट । एम पी सिंह 
देश की खेती को “जहर से मुक्त” करने के नाम पर अब किसानों की जेब पर सीधा वार करने की तैयारी हो रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में उर्वरक असंतुलन और गिरते मृदा स्वास्थ्य का हवाला देकर यूरिया की कीमतें बढ़ाने की सिफारिश के बाद किसान संगठनों में जबरदस्त नाराजगी है।
इसी कड़ी में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने केंद्र सरकार की नीति को “किसान विरोधी प्रयोग” करार देते हुए तीखा हमला बोला है।

 “पहले महंगाई, फिर प्रोत्साहन का झुनझुना”

नरेश चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि सरकार की मंशा पूरी तरह उजागर है—

“पहले यूरिया को महंगा करो, फिर उसी बढ़ी हुई लागत के बदले किसान को नकद प्रोत्साहन का लालच दो। यह सुधार नहीं, धोखे की नीति है।”

उनका कहना है कि खेती सुधारने का रास्ता कीमतें बढ़ाने से नहीं बल्कि नीतिगत सुधार, ईमानदार क्रियान्वयन और भ्रष्ट तंत्र पर लगाम से होकर जाता है।

किसानों की लागत बढ़ाने की तैयारी?

भाकियू नेता ने चेताया कि 2018 से ₹242 प्रति 45 किलो बैग पर स्थिर यूरिया की कीमत बढ़ी तो इसका सीधा असर फसल लागत, उत्पादन मूल्य और अंततः किसानों की आय पर पड़ेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि मिट्टी स्वास्थ्य सुधार के नाम पर प्रस्तावित प्रति एकड़ नकद सहायता किसानों की वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं कर पाएगी।

 मिट्टी बीमार, नीति पर सवाल

आर्थिक सर्वेक्षण में देश की मिट्टी की हालत को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है।

  • मौजूदा एनपीके अनुपात: 10.9 : 4.1 : 1
  • आदर्श अनुपात: 4 : 2 : 1

सरकार यूरिया के अत्यधिक उपयोग को इस असंतुलन का कारण बता रही है, लेकिन भाकियू का सवाल है—
👉 क्या किसान जानबूझकर मिट्टी खराब कर रहा है, या फिर व्यवस्था ने उसे उसी ओर धकेला है?

 “सब्सिडी में पारदर्शिता क्यों नहीं?”

नरेश चौधरी ने कहा कि अगर सरकार वाकई संतुलित उर्वरक उपयोग चाहती है तो—

  • उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में पारदर्शिता लाए
  • कालाबाजारी और भ्रष्टाचार पर सख्ती करे
  • किसानों को वैज्ञानिक तरीके से संतुलित खाद के लिए प्रशिक्षित करे

कीमतें बढ़ाकर किसान को जिम्मेदार ठहराना अन्यायपूर्ण है।

 किसान फिर प्रयोगशाला?

भाकियू अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार हर बार की तरह इस बार भी किसानों को नीति प्रयोगों की प्रयोगशाला बना रही है।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उर्वरक नीति में बदलाव किसानों के हितों को नजरअंदाज कर किया गया, तो इसका जोरदार विरोध किया जाएगा।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने खेती सुधार की बहस को फिर केंद्र में ला दिया है, लेकिन सवाल अब भी कायम है—
क्या खेती का भविष्य महंगाई में छिपा है या ईमानदार सुधार में?
फिलहाल इतना तय है कि यूरिया की कीमतों को लेकर उठी यह चिंगारी आने वाले दिनों में बड़े किसान आंदोलन का संकेत दे रही है।

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