गजरौला में रासायनिक कारखानों के खिलाफ भाकियू का धरना जारी, 12वें दिन दिखी सामाजिक समरसता
रासायनिक कारखानों से बिगड़ता पर्यावरण बना आंदोलन की धुरी, ‘हर हर महादेव’ से ‘अल्लाहु अकबर’ तक एक मंच पर गूंजी आवाजें
अमरोहा | 01 जनवरी 2026 | डिजिटल डेस्क
अमरोहा जिले के औद्योगिक कस्बे गजरौला में रासायनिक कारखानों से फैल रहे भूमिगत जल प्रदूषण के विरोध में भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) का धरना-प्रदर्शन नए साल के पहले दिन 12वें दिन भी पूरी मजबूती से जारी रहा। यह आंदोलन केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नववर्ष के अवसर पर साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता की सशक्त मिसाल बनकर उभरा।
लालची विकास मॉडल पर सीधा हमला
गजरौला क्षेत्र में बड़े-बड़े रासायनिक कारखानों और मशीन आधारित औद्योगिक गतिविधियों ने जल–जंगल–जमीन को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि तथाकथित विकास ने क्षेत्र की जलवायु, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को संकट में डाल दिया है।
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा—
“आज तक ऐसा कोई विकास मॉडल नहीं बन पाया, जो जल-जंगल-जमीन और हवा को नुकसान पहुंचाए बिना आगे बढ़ सके। यह सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक समरसता ही किसी भी आंदोलन की असली ताकत होती है।
‘जियो और जीने दो’ बनाम विनाशकारी विकास
आंदोलन से जुड़े किसानों और ग्रामीणों का कहना है कि वे अन्न-जल संरक्षण और प्रकृति के सम्मान में विश्वास रखते हैं, लेकिन लालच आधारित ढांचागत विकास ने प्राकृतिक संसाधनों को उजाड़ दिया है।
प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने अपने संबोधन में स्वीकार किया कि—
- क्षेत्र में अविश्वास और सामुदायिक दूरी बढ़ी है
- साझा लक्ष्य और पूर्ण एकजुटता हासिल करना पहले से ज्यादा कठिन हुआ है
जन-जागरूकता को आंदोलन का आधार
राष्ट्रीय सचिव चंद्रपाल सिंह ने कहा—
“नववर्ष का सबसे बड़ा संकल्प यही है कि गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया जाए। यह मुद्दा सामूहिक प्रयास के बिना हल नहीं हो सकता।”
उन्होंने बताया कि स्वयंसेवक लगातार ग्रामीण इलाकों में जाकर जल प्रदूषण और उसके खतरों को लेकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं।
रोजगार बनाम राशन की राजनीति
किसान नेताओं ने सरकारों की नीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा—
- सरकारों का दायित्व रोजगार देना था
- लेकिन वे केवल राशन वितरण तक सीमित रह गई हैं
- रोजगार मिलने पर जनता स्वयं राशन खरीद सकती है
नौकरशाही पर बड़ा सवाल
प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने कहा—
- भारत से अंग्रेज चले गए, लेकिन अंग्रेजी शासन पद्धति आज भी जारी है
- नौकरशाही ने भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दे दिया है
उन्होंने सुझाव दिया—
- उच्च पदों पर 3 या 5 वर्ष से अधिक स्थायी तैनाती न हो
- हर अधिकारी का पब्लिक पोर्टल हो
- जनता द्वारा रेटिंग सिस्टम लागू किया जाए
उनका दावा है कि इससे—
- विकास और अर्थव्यवस्था दोनों को गति मिलेगी
- गजरौला जैसी भूमिगत जल प्रदूषण की समस्याएं सुधरेंगी
- शासन और नेता दोनों जवाबदेह बनेंगे
ट्रैक्टर-ट्रॉली जुलूस, धरना स्थल पर जुटी भीड़
गुरुवार को किसानों ने ट्रैक्टर-ट्रॉली जुलूस निकालते हुए शहबाजपुर डोर धरना स्थल पहुंचकर आंदोलन को समर्थन दिया। हाथों में झंडे लिए किसानों ने एकजुटता का प्रदर्शन किया।
नववर्ष पर साम्प्रदायिक समरसता की अनोखी तस्वीर
धरना स्थल पर ऐसा दृश्य देखने को मिला, जो मौजूदा दौर में नजीर बन गया—
एक मंच – अनेक आस्थाएं
- हर हर महादेव
- अल्लाहु अकबर
- बोले सो निहाल, सत श्री अकाल
साझा प्रार्थनाएं
- कुरान ख्वानी
- गुरुबाणी पाठ
- विधिवत यज्ञ-हवन
सभी धर्मगुरुओं ने—
- जल-जंगल-जमीन को प्रदूषण से मुक्ति
- धरने की सफलता
- देशभर के किसानों की खुशहाली
के लिए दुआ, अरदास और प्रार्थना की।
‘हमारी जाति, हमारा धर्म—किसान’
नरेश चौधरी ने स्पष्ट कहा—
“हमारी जाति, धर्म और मजहब सिर्फ किसान है। भाईचारा ही हमारी पहचान है।”
ये रहे आंदोलन के प्रमुख चेहरे
धरना स्थल पर विभिन्न समुदायों के धर्मगुरुओं के साथ-साथ—
- अरुण सिद्धू, चंद्रपाल सिंह,रामकृष्ण चौहान, ओम प्रकाश, सुशील चौधरी, नूर चौधरी, सरदार जगपाल सिंह, आज़म खान, आसिफ खान, आरिफ खान, हरज्ञान सिंह, अब्दुल रशीद, अमरजीत राय, मलखान सिंह, मोईन अली सहित बड़ी संख्या में किसान नेता मौजूद रहे।
गजरौला का यह आंदोलन अब केवल भूमिगत जल प्रदूषण के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक एकता और वैकल्पिक विकास मॉडल की मजबूत आवाज बनता जा रहा है। नववर्ष पर दिखी साम्प्रदायिक समरसता ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का काम किया है।












