नववर्ष का बहिष्कार नहीं, व्यवस्था का बहिष्कार
गजरौला का ‘विकसित नरक’ और ज़हरीली हवा–पानी के खिलाफ किसानों की चेतावनी
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विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट डिजीटल डेस्क
गजरौला (अमरोहा)।
जब पूरा देश 31 दिसंबर की रात जश्न की उलटी गिनती में मशगूल है, तब गजरौला के किसान नए साल के स्वागत से नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था से दूरी बना रहे हैं। यह फैसला किसी त्योहार-विरोध का नहीं, बल्कि ज़हरीली हवा, ज़हरीले पानी और ज़हरीले सिस्टम के खिलाफ मौन विद्रोह का है।
गजरौला के किसानों ने साफ कर दिया है—
“जहां सांस लेना संघर्ष हो, वहां जश्न अश्लील लगता है।”
औद्योगिक विकास या पर्यावरणीय नरसंहार?
नौवें दिन भी जारी धरना, पर जवाबदेही शून्य
गजरौला औद्योगिक हब के रूप में भले “विकसित” कहलाता हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि—
- रासायनिक कारखानों से निकला अपशिष्ट
- 🌫️ हवा को धीमा ज़हर
- 💧 भू-जल को स्थायी बीमारी
- 🌱 मिट्टी को बंजर भविष्य
में बदल चुका है।
- भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के नेतृत्व में
शहबाजपुर डोर में नौवें दिन भी धरना जारी है। - सबसे गंभीर तथ्य यह कि—
- न कोई स्वतंत्र पर्यावरणीय जांच
- न प्रदूषण के आंकड़े सार्वजनिक
- न दोषियों की पहचान
- न सज़ा की प्रक्रिया
यह चुप्पी खुद में एक स्वीकारोक्ति बनती जा रही है।
“यह गजरौला नहीं, विकसित नरक है”
अरुण सिद्धू का सिस्टम पर सीधा हमला
भाकियू (संयुक्त मोर्चा) के प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने अपने वक्तव्य में जो कहा, वह सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि नीति–निर्माताओं के लिए आरोपपत्र है।
उनका कहना है—
- यदि हवा, पानी और मिट्टी शुद्ध नहीं हुई—
- तो इंसानी फेफड़े दौड़ नहीं पाएंगे
- शरीर काम लायक नहीं रहेगा
- खेती उत्पादक नहीं बचेगी
- और अगली पीढ़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएगी
उन्होंने व्यंग्यात्मक लेकिन कड़वे शब्दों में कहा—
“सरकार चुनने का पाप किया है,
तो अब गजरौला का विकसित नरक भोगना ही होगा।
यहां इंसानी मांग निषेध है,
विरोध वर्जित है,
और नरक के कायदे में रहना अनिवार्य है।”
हवा–पानी पर टैक्स: नया नमक सत्याग्रह क्यों जरूरी?
अरुण सिद्धू ने ब्रिटिश काल के नमक कर की याद दिलाते हुए मौजूदा कर-नीति को उससे भी अधिक विडंबनापूर्ण बताया—
- 🌀 एयर प्यूरीफायर → 18% GST
- 🚰 RO वाटर प्यूरीफायर → टैक्स
- मतलब—
- साफ हवा चाहना = विलासिता
- साफ पानी पीना = लक्ज़री
“अंग्रेज़ों ने नमक पर टैक्स लगाया तो देश उठ खड़ा हुआ,
आज सरकार हवा-पानी पर टैक्स लगा रही है
और हम चुप हैं।”
यह सवाल अब सिर्फ गजरौला का नहीं,
बल्कि हर औद्योगिक क्षेत्र का भविष्य है।
मुफ़्त बिजली, महंगे मीटर और लोकलूट की राजनीति
- वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल सस्ते
लेकिन देश में दाम स्थिर या ऊंचे - किसानों को मुफ़्त बिजली की घोषणाएं
पर—- स्मार्ट मीटर
- अतिरिक्त टैक्स
- निजी कंपनियों का मुनाफा
प्रश्न सीधा है—
क्या इसे लोकसेवा कहा जाए या लोकलूट?
प्रदूषण बीमारियां बढ़ा रहा है, स्वास्थ्य नीति गायब है
- कैंसर, सांस की बीमारियां, त्वचा रोग
- लेकिन—
- न विशेष स्वास्थ्य सर्वे
- न मुफ्त इलाज
- न प्रदूषण फैलाने वालों से वसूली
किसानों का कहना है—
“समग्र स्वास्थ्य तंत्र आज भी सिर्फ भाषणों में है।”
✍️ संपादकीय टिप्पणी: आंदोलन व्यक्ति नहीं, विचार से जीते जाते हैं
यह आंदोलन अपनी पीड़ा, तर्क और नैतिकता में मजबूत है।
लेकिन इतिहास यही सिखाता है कि—
जब आंदोलन किसी एक चेहरे पर टिकता है,
तो सत्ता उसे तोड़ने में देर नहीं लगाती।
👉 इस आंदोलन के नेतृत्व के लिए एक जरूरी सलाह:
- यह संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष का नहीं,
बल्कि—- हवा का
- पानी का
- मिट्टी का
- और आने वाली पीढ़ियों के जीवन का है।
- नेतृत्व सामूहिक होना चाहिए, ताकि—
- आंदोलन व्यक्तिनिर्भर न बने
- दमन, समझौते या बदनाम करने की रणनीति विफल हो
- हर किसान खुद को नेतृत्व का हिस्सा माने
📌 सामूहिक नेतृत्व ही आंदोलन को लंबी उम्र देता है।
📌 विचार केंद्र में रहे, चेहरा नहीं।
निष्कर्ष: यह जश्न का बहिष्कार नहीं, चेतावनी है
गजरौला के किसानों का नववर्ष न मनाने का निर्णय—
- व्यवस्था को आईना दिखाने का प्रयास है
- “विकास” की परिभाषा पर सवाल है
- और आने वाले समय की गंभीर चेतावनी है
यदि आज गजरौला को नजरअंदाज किया गया,
तो कल हर औद्योगिक शहर
एक-एक कर ‘विकसित नरक’ बनता जाएगा।
🛑 यह सिर्फ धरना नहीं है,
यह भविष्य की अंतिम दस्तक है।












