जनसुनवाई पोर्टल पर उठी आवाज़, प्रशासन ने बताया ‘निराधार’
पत्रकार की शिकायत पर जिला प्रशासन की रिपोर्ट: कोर्ट में लंबित मामला बना बड़ी ढाल
डिजिटल डेस्क | बिजनौर
उत्तर प्रदेश सरकार की जनसुनवाई पोर्टल व्यवस्था, जिसे आम आदमी की शिकायतों का त्वरित समाधान मंच माना जाता है, एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
इस बार मामला जुड़ा है बिजनौर के एक स्थानीय पत्रकार हाजी मोहम्मद रिजवान कुरैशी की शिकायत से, जिसे प्रशासन ने जांच के बाद “निराधार” करार देने की संस्तुति कर दी है।
लेकिन सवाल सिर्फ एक शिकायत का नहीं है—
सवाल है सरकारी जमीन, अवैध कब्जे, न्यायालय की यथास्थिति और प्रशासनिक जिम्मेदारी के आपसी टकराव का।
क्या है पूरा मामला?
अफजलगढ़ (तहसील धामपुर) निवासी पत्रकार हाजी मो. रिजवान कुरैशी ने
➡️ 14 दिसंबर 2025 को
➡️ जनसुनवाई पोर्टल पर
➡️ संदर्भ संख्या 40013425034011 के तहत शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत का मूल आशय था—
👉 सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जा
👉 और उस पर प्रशासनिक कार्रवाई न होना
पत्रकार का आरोप था कि स्थानीय स्तर पर शिकायतों के बावजूद अतिक्रमण हटाने में ढिलाई बरती जा रही है।
प्रशासन की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
जिला विद्यालय निरीक्षक, बिजनौर द्वारा जिलाधिकारी को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया कि—
- मामला न्यायालय सिविल जज (जू.डि.), नगीना में
- वाद संख्या 118/2015 के रूप में विचाराधीन है
- माननीय न्यायालय ने 16 अक्टूबर 2025 को
👉 यथास्थिति बनाए रखने का आदेश पारित किया है
इसी आधार पर प्रशासन का कहना है कि—
➡️ कोर्ट के आदेशों के चलते
➡️ किसी भी प्रकार की बलपूर्वक कार्रवाई संभव नहीं
➡️ इसलिए शिकायत निराधार प्रतीत होती है
कोर्ट की ‘यथास्थिति’ या प्रशासनिक बहाना?
यहीं से शुरू होता है असली विवाद।
विशेषज्ञों का मानना है कि—
“यथास्थिति का आदेश अतिक्रमण को वैध नहीं बनाता,
बल्कि प्रशासन से यह अपेक्षा करता है कि वह
कोर्ट के समक्ष स्पष्ट तथ्य रखे।”
लेकिन इस मामले में—
❓ क्या प्रशासन ने समय रहते ठोस रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की?
❓ क्या अवैध कब्जे की स्थिति स्पष्ट रूप से चिन्हित की गई?
❓ या फिर ‘यथास्थिति’ को ढाल बनाकर फाइल बंद करने की तैयारी है?
पत्रकार बनाम सिस्टम: सवालों की लंबी सूची
यह मामला केवल एक व्यक्ति की शिकायत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है—
- जनसुनवाई पोर्टल की सीमाएं
- प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही
- और न्यायालयी प्रक्रिया की आड़ में
स्थानीय स्तर पर फैसलों को टालने की प्रवृत्ति
पत्रकार संगठनों का कहना है कि—
“अगर शिकायतकर्ता आम नागरिक या पत्रकार हो,
तो उसकी शिकायत को ‘निराधार’ बताकर
पोर्टल से हटाना आसान रास्ता बन गया है।”
जनसुनवाई पोर्टल: समाधान या सांख्यिकी?
सरकारी आंकड़ों में भले ही
✔️ हजारों शिकायतों का निस्तारण दिखाया जाता हो,
लेकिन जमीनी हकीकत में—
- कई मामलों में
🔸 निस्तारण = फाइल बंद
🔸 समाधान = शून्य
बिजनौर का यह मामला उसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है।
निष्कर्ष: सवाल अभी बाकी हैं
हाजी मो. रिजवान कुरैशी की शिकायत को भले ही प्रशासन ने
“निराधार” करार दे दिया हो,
लेकिन इससे जुड़े सवाल अभी भी कायम हैं—
👉 क्या सरकारी जमीन सुरक्षित है?
👉 क्या न्यायालय के आदेशों की सही व्याख्या हो रही है?
👉 और क्या जनसुनवाई पोर्टल वाकई जनता की आवाज़ बन पा रहा है?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते,
तब तक हर ‘निस्तारण’ अपने साथ
एक नया संदेह छोड़ जाता है।
यह रिपोर्ट केवल तथ्यों और आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित है।
मामला न्यायालय में विचाराधीन है।











