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व्यंग्य “हिकमत अली हर केस में मौजूद है !”

      हिकमत अली हर केस में मौजूद है !

जबअदालतों  में इंसाफ़ से ज़्यादा भाषा कटघरे में खड़ी दिखती है

अदालत का दृश्य है। भीड़ खचाखच भरी है। पुलिस मुलजिम को पेश करती है।
सरकारी वकील पूरे आत्मविश्वास के साथ कहता है—
“जज साहब, यह बेहद खतरनाक अभियुक्त है, जिसे पुलिस ने हिकमत अमली से गिरफ्तार किया है।”

इतना सुनते ही बचाव पक्ष का पैरोकार उछल पड़ता है—
“माई लॉर्ड! यह सरासर झूठ है। हर केस में यही हिकमत अली कैसे आ जाता है?”

और फिर—
न्याय के मंदिर में ठहाकों की गूंज।
मुलजिम मुस्कुरा रहा है, वकील मुस्कुरा रहे हैं, जज संयम साधे बैठे हैं—
कटघरे में अगर कोई खड़ा है, तो वह है कानून की भाषा

यह कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि हमारी न्यायिक व्यवस्था की रोज़मर्रा की सच्चाई है। एक ऐसा सच, जो हंसाता भी है और सोचने पर मजबूर भी करता है।

जब “शहादत” शहादत नहीं होती

थाने का एक आम-सा संवाद—
“साहब शहादत में गए हैं।”

साथ खड़ा नया पत्रकार चौंकता है—
“क्या कोई शहीद हो गया?”

असलियत?
साहब तो बस कोर्ट में गवाही देने गए हैं।
यहाँ शहादत का मतलब बलिदान नहीं, बल्कि साक्ष्य है।

यानी शब्द वही, भाव बिल्कुल उल्टा।
और यहीं से शुरू होती है वह उलझन, जिसमें आम आदमी सबसे पहले गिरफ्तार हो जाता है—भाषा के आरोप में

कानून की फाइलें और उर्दू की भारी शान

पुलिस और अदालतों की फाइलें पलटिए,
आपको उर्दू के ऐसे-ऐसे नायाब शब्द मिलेंगे कि लगेगा
मामला नहीं, मुशायरा चल रहा है।

  • हिकमत अमली – रणनीति
  • तहरीर – प्रार्थना पत्र
  • इस्तगासा – परिवाद
  • इजरा – क्रियान्वयन
  • मुल्तवी – स्थगित
  • सबब – कारण
  • मसलन – उदाहरण
  • मसला – समस्या

अब मसला और मसलन में फर्क वही समझे,
जो या तो वकील हो,
या पुलिस में हो,
या फिर खुद किसी मुकदमे में पिस चुका हो।

बाकी लोगों के लिए तो “मसलन” भी ऐसा लगता है जैसे
किसी चीज़ को मसलने की प्रक्रिया चल रही हो—
और सच्चाई यही है कि न्यायिक प्रक्रिया में
आम आदमी सबसे ज़्यादा मसल दिया जाता है।

उर्दू मीठी है, मगर हर जगह नहीं

इसमें कोई शक नहीं—
उर्दू मीठी ज़ुबान है।
शायरी, ग़ज़ल, फिल्मी गीत—
उर्दू के बिना अधूरे हैं।

“इश्क़”, “दर्द”, “ख़ामोशी”, “तन्हाई”—
इन शब्दों के बिना भावनाओं की अभिव्यक्ति की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

लेकिन वही उर्दू जब
एफ़आईआर, चार्जशीट और अदालती आदेशों में उतरती है,
तो मीठास बोझ में बदल जाती है।

यहाँ ज़ुबान भाव नहीं, भ्रम पैदा करती है।

नई पुलिस, नई हिंदी—पर समस्या पुरानी

पुराने पुलिसकर्मी इन शब्दों के साथ पले-बढ़े हैं।
नई पीढ़ी हिंदी में लिखने की कोशिश कर रही है—
यह बदलाव स्वागतयोग्य है।

मगर सवाल सिर्फ भाषा बदलने का नहीं है,
सवाल है समझ पैदा करने का

कानून अगर जनता के लिए है,
तो उसकी भाषा भी जनता की होनी चाहिए।
वरना इंसाफ़ तो मिल जाएगा,
लेकिन समझ किसी को नहीं आएगी।

असली “सबब” क्या है?

असल सबब यह नहीं कि उर्दू कठिन है।
असल सबब यह है कि
हमने सवाल पूछना छोड़ दिया है,
अर्थ जानने की जिज्ञासा खो दी है।

हम शब्दों से डरते हैं,
और फिर कहते हैं—
“कानून आम आदमी के बस का नहीं।”

अब भी वक्त है

जरूरत है कि
हिकमत अमली सिर्फ अपराधी पकड़ने में नहीं,
भाषा को सरल बनाने में भी अपनाई जाए।

वरना आने वाले समय में
अदालतों में फैसले तो सुनाए जाएंगे,
लेकिन बाहर खड़ी जनता यही पूछती रह जाएगी—

“हुज़ूर, इंसाफ़ हो गया…

मगर कहा क्या गया था?”**

यही है हमारे सिस्टम का सबसे बड़ा, सबसे खामोश मसला
और इसे समझना ही सबसे ज़रूरी मसलन है।

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