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“पूर्व सैनिकों की शिकायतें अब फाइलों में नहीं — जिलाधिकारी ने दिए कड़े निर्देश, सम्मानित हुए दो वीर”

बिजनौर में सैनिक बंधु बैठक:

पूर्व सैनिकों की समस्याओं पर कलेक्टर जसजीत कौर का ‘एक्शन मोड’, अधिकारियों को कड़े निर्देश — “फाइलों में दबे नहीं रहेंगे हमारे सैनिकों के मुद्दे”

अवनीश त्यागी की धारदार विशेष रिपोर्ट

बिजनौर का कलेक्ट्रेट सभागार सोमवार दोपहर तब एक अलग ही ऊर्जा से भर उठा जब जिलाधिकारी जसजीत कौर ने जिला सैनिक बंधु बैठक की कमान संभाली। यह केवल एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि एक ऐसा मंच बना, जहाँ प्रशासन की संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और त्वरित कार्रवाई का असली चेहरा सामने आया।

इस बैठक का संदेश साफ था —
“पूर्व सैनिकों की समस्याएँ प्राथमिकता हैं… और इनके समाधान में किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

सम्मान का क्षण — मेडल हो या खेती, पूर्व सैनिकों का हर योगदान सम्माननीय

बैठक की शुरुआत प्रेरणादायक और भावनात्मक रही।

  • चीन में आयोजित एशियन मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले पूर्व सैनिक तरुण कुमार को जिलाधिकारी ने सम्मानित किया।
  • वहीं कृषि में नए प्रयोग कर किसानों के लिए प्रेरणा बने पूर्व सैनिक राहुल जवान को भी “जय जवान–जय किसान” की भावना को साकार करने के लिए शील्ड प्रदान की गई।

यह सिर्फ सम्मान नहीं था —
यह संदेश था कि “फौज छोड़ी है… फौजीपन नहीं।”

कलेक्टर का ‘क्लियर कट’ निर्देश —

“लंबित प्रकरण तुरंत उठाओ, कार्रवाई शुरू करो और परिणाम दो!”**

बैठक में सबसे पहले जिलाधिकारी ने विभागीय शिथिलता पर सख्त नाराजगी जताई।
उन्होंने कहा—

  • कुछ प्रकरण सिर्फ इसलिए लंबित रह गए क्योंकि विभागीय अधिकारी एसआईआर कार्य में व्यस्त थे।
  • यह स्वीकार्य नहीं।
  • सभी लंबित मामलों को तुरंत संबंधित विभागों को पुनः भेजा जाए और परिणाम की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

उनकी आवाज़ में स्पष्टता थी —
“पूर्व सैनिकों के मामले ‘फाइलों का बोझ’ नहीं… जिला प्रशासन की ज़िम्मेदारी हैं।”

 रेलवे की आपत्ति पर तीखा रुख —

“शहीद स्मारक के मामले में देरी नहीं, समाधान चाहिए”**

एक विधवा सैनिक की पीड़ा बैठक में सामने आई —
गांव भवानीपुर में शहीद स्मारक व द्वार निर्माण पर रेलवे विभाग ने आपत्ति लगा दी थी।

जिलाधिकारी ने इस पर गंभीरता दिखाते हुए आदेश दिया—

  • रेलवे अधिकारियों से तत्काल बैठक कर समाधान खोजा जाए
  • प्रशासन स्वयं इस मामले की मॉनिटरिंग करेगा

उनका रुख साफ था —
“शहीदों की स्मृति पर किसी प्रकार की बाधा स्वीकार नहीं।”

ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी पर सवाल — अब होगी सख्त कार्रवाई

पूर्व सैनिकों ने कई समस्याएँ रखीं—

  • जंगली जानवरों से फसल चौपट
  • बरसाती नाले से खेतों का कटान
  • दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का लाभ न पहुँचना

जिलाधिकारी ने आदेश दिया—

  • सभी विभागों के साथ समन्वय बैठकों की श्रृंखला बनाई जाए
  • जिन क्षेत्रों में अधिकारी नहीं पहुँचते, वहाँ फील्ड विज़िट अनिवार्य की जाए

ये निर्देश संकेत देते हैं कि अब ‘कागज़ी योजनाओं’ का दौर खत्म — ‘जमीन पर काम’ का समय शुरू।

 पूर्व सैनिकों की आवाज़ को मिली सीधी पहुँच —

“आपके लिए प्रशासन के दरवाज़े हमेशा खुले हैं”**

जिलाधिकारी ने कहा—

“सैनिक बंधु बैठक एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं… यह आपकी आवाज़ को शासन तक सीधी पहुँच देने का सशक्त प्लेटफॉर्म है।”

उन्होंने एक-एक शिकायत को गंभीरता से सुना और मौके पर ही संबंधित विभागों को आदेश दिए।

बैठक में रखी गई प्रमुख शिकायतें —

  • सड़क निर्माण और रख-रखाव
  • भूमि विवाद एवं अतिक्रमण
  • शस्त्र लाइसेंस संबंधी समस्याएँ
  • आवागमन और सिंचाई की दिक्कतें
  • सरकारी योजनाओं से वंचित होना

कलेक्टर ने स्पष्ट भरोसा दिया—
“आपकी हर समस्या का प्राथमिकता के साथ समाधान होगा, और बिना देरी होगा।”

 विश्लेषण:

इस बैठक ने क्या संदेश दिया?**

इस पूर्ण बैठक से तीन ठोस संकेत निकलते हैं—

1. प्रशासन अब ‘प्रतिक्रिया’ नहीं, ‘प्रो-एक्टिव मोड’ में है।

पहले कई प्रकरण लंबित थे, अब कलेक्टर ने साफ कर दिया — “लंबित फाइलें जीरो होनी चाहिए।”

2. पूर्व सैनिकों को सम्मान और समाधान दोनों एक–साथ मिल रहे हैं।

सिर्फ सम्मान का मंच नहीं, समस्याओं का समाधान भी उसी मंच पर।

3. ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं।

दूर-दराज के गाँवों की समस्याएँ पहली बार इतने केंद्रीय तरीके से उठीं और तुरंत कार्रवाई का भरोसा दिया गया।

🔚 निष्कर्ष —

पूर्व सैनिकों के लिए प्रशासन की यह प्रतिबद्धता जिले में एक नई व्यवस्था की ओर संकेत**

बैठक के दौरान मौजूद जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कैप्टन अनिल गुप्ता तथा सभी विभागीय अधिकारियों ने जिलाधिकारी के निर्देशों को गंभीरता से नोट किया।

कह सकते हैं —
इस बैठक ने पूर्व सैनिकों के विश्वास को मज़बूत किया है और प्रशासन को ज़िम्मेदारियों की नई सूची थमा दी है।

और सबसे अहम —
अब सैनिकों की समस्याएँ ‘फाइलों में बंद’ नहीं रहेंगी… ‘कार्रवाई की मेज’ पर होंगा।

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