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यूपी बिजली निजीकरण पर बवाल: संघर्ष समिति ने उठाए 5 बड़े सवाल, सीबीआई जांच की मांग

 यूपी बिजली निजीकरण पर बवाल: संघर्ष समिति ने उठाए 5 बड़े सवाल, सीबीआई जांच की मांग

  • निजीकरण या घोटाला? संघर्ष समिति ने उठाए गंभीर सवाल”
  • “बिजली कर्मचारियों का हल्ला बोल: सीबीआई जांच की मांग”
  • “कॉर्पोरेट घरानों के दबाव में यूपी बिजली का सौदा?”
  • “42 जिलों की बिजली व्यवस्था पर संकट”
  • “बिजली उपभोक्ताओं पर बढ़ेगा बोझ?”

 प्रमुख हाइलाइट्स

  • पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण पर बड़ा विवाद

  • कॉर्पोरेट घरानों से मिलीभगत और घोटाले की आशंका

  • ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट की नियुक्ति पर गंभीर सवाल

  • ड्राफ्ट बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 सार्वजनिक न करना संदेहास्पद

  • सीबीआई जांच और निजीकरण रद्द करने की मांग

निजीकरण पर बड़ा घोटाले का अंदेशा

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने दावा किया है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण में कॉर्पोरेट घरानों से मिलीभगत और घोटाले की गंध है। समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच कराने और निजीकरण का निर्णय निरस्त करने की मांग की है।

संघर्ष समिति के पांच बड़े सवाल

1️⃣ कॉर्पोरेट की गुप्त भागीदारी

नवंबर में लखनऊ में हुई मीटिंग में निजी घरानों की बड़ी भागीदारी रही और उन्होंने कार्यक्रम को स्पॉन्सर भी किया। इसी बैठक में पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष डॉ. आशीष गोयल को डिस्कॉम एसोसिएशन का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया।

2️⃣ ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट पर सवाल

ग्रांट थॉर्टन को नियुक्त करने पर हितों के टकराव और झूठे शपथपत्र का आरोप है। अमेरिका में पेनल्टी लगने की बात मानने के बाद भी इसे नहीं हटाया गया।

3️⃣ ड्राफ्ट बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 विवाद

यह डॉक्यूमेंट अब तक पब्लिक डोमेन में नहीं रखा गया। 2020 के पुराने ड्राफ्ट पर आई आपत्तियों का भी निस्तारण नहीं हुआ। समिति का आरोप है कि गुपचुप तरीके से निजीकरण आगे बढ़ाया गया

4️⃣ कॉर्पोरेट घरानों को विश्वास में लेना

टाटा पावर के सीईओ प्रवीर सिन्हा के बयानों से समिति का आरोप मजबूत होता है कि निजीकरण डॉक्यूमेंट कॉर्पोरेट घरानों से चर्चा कर तैयार किए गए

5️⃣ कौड़ियों के मोल बिक्री का खतरा

इक्विटी को लॉन्ग टर्म लोन में बदलकर 42 जिलों की बिजली व्यवस्था मनचाहे घरानों को कौड़ियों के दाम सौंपी जा रही है।

संघर्ष समिति का ऐलान

समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे और अन्य पदाधिकारियों ने कहा कि

  • यूपी में करोड़ों की संपत्तियों को लूटने की तैयारी है।
  • भ्रष्टाचार रोकने के लिए सीएम को हस्तक्षेप करना चाहिए।
  • निजीकरण विरोधी अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक फैसला वापस नहीं लिया जाता।

 विश्लेषण 

  • यह मामला केवल कर्मचारियों और प्रबंधन का विवाद नहीं, बल्कि प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं और किसानों से जुड़ा है।
  • अगर निजीकरण कौड़ियों के मोल होता है तो इसका असर सीधे बिजली दरों और उपभोक्ता सेवाओं पर पड़ सकता है।
  • समिति का रुख साफ है कि यह मामला “पारदर्शिता बनाम कॉर्पोरेट गठजोड़” का है।

उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण पर उठे सवाल केवल प्रशासनिक निर्णय पर नहीं, बल्कि नीतिगत पारदर्शिता और जनहित से जुड़े हैं। संघर्ष समिति का सीबीआई जांच का आग्रह और निजीकरण रोकने की मांग आने वाले दिनों में राजनीतिक और जनआंदोलन का रूप ले सकती है।

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