“बिजली निजीकरण: मुनाफा निजी कंपनियों का, बोझ जनता की जेब पर?”
“₹1 में 42 जिलों की जमीन! संघर्ष समिति का बड़ा खुलासा”

संघर्ष समिति का बड़ा सवाल – मुनाफा निजी कंपनियों को, खर्च जनता और सरकार क्यों उठाए?
विवाद की जड़
उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया पर बिजली कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने तीखे सवाल उठाए हैं। समिति का दावा है कि सरकार निजीकरण की आड़ में निजी घरानों को मुनाफा दिलाने और जनता पर बोझ डालने का काम कर रही है।
संघर्ष समिति के मुख्य आरोप
- निजीकरण के बाद भी सरकार निजी कंपनियों को सब्सिडी देगी – जब तक कंपनियां मुनाफे में नहीं आ जातीं।
- 42 जिलों की करोड़ों की सरकारी जमीन मात्र ₹1 लीज पर निजी घरानों को दी जाएगी।
- घाटे और देनदारियों का पूरा बोझ सरकार पर रहेगा, जबकि निजी कंपनियों को मिलेगी “क्लीन बैलेंस शीट”।
- महंगे पावर परचेज एग्रीमेंट की वजह से पहले ही सरकार सालाना ₹6761 करोड़ फिक्स चार्ज दे रही है, चाहे बिजली खरीदी जाए या नहीं।
- धारा 1.1 (एफ) के तहत सरकार 05–07 साल या उससे अधिक समय तक निजी कंपनियों को आर्थिक मदद देती रहेगी।
समिति की अपील
संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर निजीकरण प्रक्रिया को निरस्त करने की मांग की।
उनका कहना है कि –
- यह पूरा सिस्टम घोटालों से भरा और बेहद संदेहास्पद है।
- सुधार की बजाय सरकारी संपत्तियों को कौड़ियों के मोल बेचना जनता के हित में नहीं।
गहराई से समझें
- जनता पर बोझ का खतरा – यदि सरकार निजी कंपनियों को वर्षों तक सब्सिडी देती रहेगी तो इसका सीधा असर बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
- सरकारी खजाने पर दबाव – पहले से ही घाटे में चल रहे वितरण निगमों पर और दबाव बढ़ेगा।
- संपत्ति का सस्ता सौदा – 42 जिलों की जमीन को ₹1 पर देना नीतिगत सुधार की बजाय घोटाले जैसा कदम माना जा रहा है।
- लंबा संघर्ष – बिजली कर्मियों का विरोध आंदोलन अब 272वें दिन में पहुंच चुका है, जो इस असंतोष की गंभीरता दिखाता है।
हाइलाइटर
- “सरकार मुनाफा निजी कंपनियों को दिला रही है, नुकसान जनता भुगतेगी” – संघर्ष समिति
- “₹1 में 42 जिलों की सरकारी जमीन, यह कौन सा सुधार?” – कर्मचारी नेता
- 272 दिन से जारी है बिजली कर्मियों का आंदोलन, निजीकरण निरस्त करने की मांग तेज।
आगे क्या?
अब सरकार पर दबाव है कि वह साफ करे—
- निजी कंपनियों को सब्सिडी कितने वर्षों तक दी जाएगी?
- हर साल सरकारी खजाने से कितना खर्च होगा?
- और सबसे अहम – क्या इससे जनता को सस्ती बिजली मिलेगी या निजी कंपनियों को गारंटीड मुनाफा?
👉 यह विवाद अब केवल बिजली कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे तौर पर जनता की जेब और राज्य की नीतिगत साख से जुड़ गया है।












