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विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रियंका सौरभ रचित कविता पढ़िए! “छोड़ो व्यर्थ पानी बहाना…”

              भूमिका

विश्व पर्यावरण दिवस को रेखांकित करता प्रतीकात्मक चित्र

पर्यावरण संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। मनुष्य की असंयमित गतिविधियों के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, जिससे पृथ्वी पर जीवन संकट में पड़ता जा रहा है। बढ़ते प्रदूषण, वनों की कटाई और जल की बर्बादी ने पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाई है। ऐसे में जागरूकता और सक्रिय भागीदारी की अत्यंत आवश्यकता है।

प्रियंका सौरभ द्वारा रचित यह कविता “छोड़ो व्यर्थ पानी बहाना…” पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक सार्थक संदेश देती है। कवयित्री वर्षा के आगमन की प्रतीक्षा करने और पानी को व्यर्थ न बहाने की प्रेरणा देती हैं। वे वनों की कटाई रोकने, शुद्ध हवा के महत्व को समझने, पक्षियों को स्वच्छ वातावरण देने, पौधारोपण को प्रोत्साहित करने और प्रदूषण के दुष्प्रभावों को समझने पर बल देती हैं। इस कविता में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और हरियाली को पुनः स्थापित करने की अपील की गई है।

कविता का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना ही नहीं, बल्कि पाठकों को पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने के लिए प्रेरित करना भी है। कवयित्री ने सरल शब्दों में गहरी भावना के साथ यह संदेश दिया है कि यदि हमें अपनी धरती को बचाना है, तो हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाना होगा। 🌿

अवनीश त्यागी 
छोड़ो व्यर्थ पानी बहाना…
बारिश को अब आने दो।
तपती गर्मी जाने दो॥
छोड़ो व्यर्थ पानी बहाना,
जीवन को बच जाने दो॥
ये बादल भी कुछ कह रहे।
इनको मन की गाने दो॥
कटते हुए पेड़ बचाओ।
शुद्ध हवा कुछ आने दो॥
पंछी क्या कहते है सुन लो।
उनको पंख फैलाने दो॥
फोटो में ही लगते पौधे।
सच को बाहर लाने दो॥
होती कैसे धरा प्रदूषित।
सबको पता लगाने दो॥
पौध लगाकर पानी दे हम।
सच्चा धर्म निभाने दो॥
चल चुकी है बहुत आरिया।
धरती कुछ बच जाने दो॥
कैसे अब हरियाली होगी।
सौरभ प्रश्न उठने दो॥
झुलस रही पावन धरती पर।
हरियाली तुम आने दो॥
प्रियंका सौरभ

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