उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण पर घमासान: भ्रष्टाचार और हितों के टकराव का आरोप

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के आह्वान पर सोमवार को प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन जारी रहा। संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता की अनदेखी की गई है और हितों के टकराव (Conflict of Interest) के प्रावधान को जानबूझकर हटा दिया गया है।
संघर्ष समिति के मुताबिक, अर्नेस्ट एंड यंग, ग्रैंड थ्रामटन और डेलॉइट जैसी कंपनियों ने ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट बनने के लिए बोली लगाई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ये कंपनियां बिजली क्षेत्र में हितों के टकराव के दायरे में आती हैं या नहीं। समिति ने सवाल उठाया कि यदि पहले हितों के टकराव को आरएफपी (Request for Proposal) में शामिल किया गया था, तो उसे हटाने की क्या जरूरत थी? समिति के पदाधिकारियों ने इसे भ्रष्टाचार का संकेत बताया और सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की।
संभावित घोटाले के चार प्रमुख बिंदु
संघर्ष समिति ने निजीकरण को लेकर चार प्रमुख आपत्तियां उठाई हैं, जो इस प्रक्रिया में संभावित घोटाले की ओर संकेत करती हैं:
- हितों के टकराव की अनदेखी: निजीकरण प्रक्रिया में शामिल कंपनियों की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल हैं। यदि ये कंपनियां पहले से ही बिजली क्षेत्र में किसी न किसी रूप में कार्यरत हैं, तो इनकी भूमिका पर संदेह उत्पन्न होता है।
- परिसंपत्तियों का मूल्यांकन नहीं किया गया: पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम की 42 जनपदों की परिसंपत्तियों का निजीकरण बिना किसी उचित मूल्यांकन के किया जा रहा है। यह प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है।
- राजस्व क्षमता का सार्वजनिक न होना: सरकार ने यह खुलासा नहीं किया है कि इन 42 जनपदों की बिजली आपूर्ति से होने वाली संभावित कमाई कितनी है। बिना इस आंकड़े के निजीकरण का आधार समझ से परे है।
- बकाया वसूली पर अनदेखी: दोनों विद्युत वितरण निगमों पर लगभग ₹66,000 करोड़ का बकाया है। यदि यह वसूली कर ली जाए, तो ये कंपनियां स्वयं लाभ में आ सकती हैं। ऐसे में, घाटे की आड़ में इनका निजीकरण करने की क्या जरूरत है?
आगरा मॉडल: 15 साल बाद भी बकाया नहीं चुकाया गया
संघर्ष समिति ने आगरा के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि जब 15 साल पहले टोरेंट पावर कंपनी को बिजली आपूर्ति सौंपी गई थी, तो ₹2,200 करोड़ का बकाया था। समझौते के तहत टोरेंट को यह रकम वसूल कर सरकार को लौटानी थी, लेकिन आज तक एक भी पैसा वापस नहीं किया गया। अब वही मॉडल पूर्वांचल और दक्षिणांचल में दोहराया जा रहा है, जहां ₹66,000 करोड़ का बकाया निजी कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन जारी
इस मुद्दे को लेकर प्रदेशभर में बिजली कर्मचारियों का आंदोलन 110वें दिन भी जारी रहा। वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, आजमगढ़, बस्ती, अलीगढ़, मथुरा, एटा, झांसी, बांदा, बरेली, देवीपाटन, अयोध्या, सुल्तानपुर, हरदुआगंज, पारीछा, ओबरा, पिपरी और अनपरा में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति का हवाला देते हुए सरकार से इस मामले में जांच की मांग की है।
क्या निजीकरण की प्रक्रिया रोक दी जाएगी?
बिजली के निजीकरण को लेकर प्रदेश में बढ़ते विरोध के बीच अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार इस प्रक्रिया को रोकने पर विचार करेगी? कर्मचारियों का मानना है कि यह निजीकरण केवल विशेष समूहों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है और इससे उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन आरोपों पर क्या रुख अपनाती है। क्या उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण का यह प्रस्ताव पारदर्शिता की कसौटी पर खरा उतर पाएगा, या यह एक और विवादित सरकारी निर्णय बनकर रह जाएगा?











