DM की क्लास में खुली पोल! ‘लखपति दीदी’ योजना की सुस्त रफ्तार देख भड़के, इन 5 ब्लॉक अफसरों पर गिरी गाज!

(ग्राउंड रिपोर्ट व इन-डेप्थ एनालिसिस: अवनीश त्यागी | TargetTvLive)
बिजनौर। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ (NRLM) और ‘लखपति दीदी’ योजना बिजनौर में सरकारी फाइलों के जाल में उलझकर रह गई है। गुरुवार को कलेक्ट्रेट के महात्मा विदुर सभागार में आयोजित समीक्षा बैठक में जब आंकड़ों का पिटारा खुला, तो हर कोई हैरान रह गया। महिला सशक्तिकरण के दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि जिले में लक्ष्य के मुकाबले आधी से भी कम प्रगति हुई है। इस पर जिलाधिकारी उमेश प्रताप सिंह का गुस्सा फूटना स्वाभाविक था। TargetTvLive की इस एक्सक्लूसिव विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में जानिए कि आखिर महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन के इस महाभियान में ब्रेक कहाँ और क्यों लगा है?
कागजी दावों का ‘पोस्टमार्टम’: आंकड़ों में बिजनौर का रिपोर्ट कार्ड
कलेक्ट्रेट सभागार में पेश किए गए आंकड़ों ने जिला प्रशासन की सुस्त कार्यशैली को बेनकाब कर दिया है। सरकार की प्राथमिकता वाली योजनाओं में बिजनौर की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए जिले को कुल 1,54,914 महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य मिला था, लेकिन सितंबर 2026 बीत जाने के बाद भी इसकी प्रगति मात्र 54 प्रतिशत पर ही अटकी हुई है। वहीं चालू वित्तीय वर्ष में 9,501 नए स्वयं सहायता समूहों (SHG) के गठन के लक्ष्य के मुकाबले धरातल पर केवल 2,144 समूहों का ही गठन किया जा सका है, जो कि निर्धारित लक्ष्य का 25 प्रतिशत भी नहीं है। इस बेहद खराब प्रदर्शन के कारण समूह गठन के मामले में बिजनौर पूरे उत्तर प्रदेश में पिछड़कर 21वीं रैंक पर पहुंच गया है। इसके अलावा समूहों को मिलने वाली शुरुआती आर्थिक मदद यानी रिवॉल्विंग फंड (RF) के वितरण में भी गंभीर लापरवाही पाई गई है, जिसके चलते इस पैमाने पर भी जिले को प्रदेश स्तर पर 18वीं रैंक से ही संतोष करना पड़ा है।
इन 5 ब्लॉक अफसरों की नपी क्लास, ‘लापरवाही पर एक्शन तय’
हाउसहोल्ड सैचुरेशन और स्वयं सहायता समूहों के गठन में बेहद घटिया प्रदर्शन करने वाले विकास खंडों के अधिकारियों पर जिलाधिकारी की गाज गिरी है। डीएम ने उपायुक्त स्वरोजगार को सख्त हिदायत देते हुए निम्नलिखित 5 ब्लॉकों के ब्लॉक मिशन मैनेजरों (BMM) को रेड वार्निंग (चेतावनी) जारी करने के निर्देश दिए हैं:
- मोहम्मदपुर देवमल
- कोतवाली
- नजीबाबाद
- किरतपुर
- जलीलपुर
डीएम उमेश प्रताप सिंह का सीधा संदेश: “जो अधिकारी राज्य के औसत के अनुरूप परिणाम नहीं दे सकते, वे अपनी कार्यप्रणाली में तत्काल सुधार लाएं। आजीविका मिशन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की महत्वाकांक्षी योजना है, इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण: आखिर कहाँ अटक रही है ‘दीदियों’ की आर्थिक आजादी?
विगत 13 वर्षों में बिजनौर के भीतर करीब 2,35,000 ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा जा चुका है। यह आंकड़ा साबित करता है कि ग्रामीण अंचल की महिलाओं में काम करने और आगे बढ़ने का जज्बा भरपूर है। लेकिन सवाल यह है कि फिर भी जिले की रैंकिंग क्यों पिछड़ रही है?
1. बैंकिंग सिस्टम का लालफीताशाही रवैया
समूह गठन के बाद भी बैंकों से क्रेडिट लिंकेज और रिवॉल्विंग फंड की फाइलें अटका कर रखी जाती हैं। जब तक दीदियों को समय पर लोन और वित्तीय मदद नहीं मिलेगी, वे स्वरोजगार कैसे शुरू करेंगी? इसी वजह से डीएम ने बैंकों के साथ अलग से संवेदीकरण (Sensitization) बैठक बुलाने के निर्देश दिए हैं।
2. ब्लॉक स्तर पर मॉनिटरिंग का अभाव
ब्लॉक मिशन मैनेजर (BMM) और जमीनी अमला केवल बैठकों और कागजी रिपोर्टिंग तक सीमित है। डोर-टू-डोर विजिट और ‘हाउसहोल्ड सैचुरेशन’ की गति धीमी होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
TargetTvLive का निष्पक्ष नज़रिया
मुख्य विकास अधिकारी (CDO) रणविजय सिंह और संबंधित अधिकारियों की मौजूदगी में हुई इस बैठक ने साफ कर दिया है कि अब केवल कागजी खानापूरी से काम नहीं चलेगा। यदि बिजनौर को प्रदेश की टॉप रैंकिंग में लाना है और 1.54 लाख से अधिक महिलाओं को सही मायनों में ‘लखपति दीदी’ बनाना है, तो प्रशासनिक मशीनरी को दफ्तरों से निकलकर गांवों की गलियों तक पहुंचना होगा।
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