पत्रकारिता या प्रेस रिलीज उद्योग? सवालों की मौत पर बजती तालियों का लोकतंत्र
जब खबरें नहीं, सरकारी और संस्थागत ‘कॉपी-पेस्ट’ छपने लगें तो समझिए पत्रकारिता आईसीयू में है
विशेष व्यंग्यात्मक विश्लेषण | अवनीश त्यागी
कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। उसका काम था सत्ता से सवाल करना, व्यवस्था की खामियां उजागर करना और जनता की आवाज बनना। लेकिन आज का दृश्य कुछ और ही कहानी कह रहा है। ऐसा लगता है कि पत्रकारिता अब खबरों की नहीं, बल्कि प्रेस रिलीज की एजेंसी बनती जा रही है।
सुबह आंख खुलते ही किसी निजी शिक्षण संस्थान की प्रेस रिलीज आ जाती है। दोपहर तक पुलिस विभाग की उपलब्धियों का बखान करती प्रेस नोट। शाम होते-होते प्रशासन की बैठकों और निर्देशों की लंबी सूची। और फिर अगले दिन वही सामग्री लगभग शब्दशः अखबारों, वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित मिल जाती है।
सवाल यह है कि यह पत्रकारिता है या प्रेस रिलीज वितरण सेवा?
प्रेस रिलीज छपी, खबर मर गई
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य तथ्यों की पड़ताल करना है। लेकिन आज कई जगहों पर स्थिति यह बन गई है कि प्रेस रिलीज आई, कॉपी हुई, पेस्ट हुई और प्रकाशित हो गई।
न कोई सवाल… न कोई जांच… न कोई दूसरा पक्ष…
बस प्रेस रिलीज ही खबर बन गई।
ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता का नया पाठ्यक्रम तैयार हो गया हो—
“Ctrl+C + Ctrl+V = एक्सक्लूसिव न्यूज़”
अगर किसी निजी स्कूल ने अपने कार्यक्रम में 50 बच्चों को सम्मानित किया तो प्रेस रिलीज में संख्या 500 भी लिखी हो, तो कई मंचों पर वह बिना जांच के प्रकाशित हो जाती है। यदि किसी विभाग ने दावा कर दिया कि उसने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर ली, तो उस दावे की पड़ताल करने की जरूरत शायद अब महसूस ही नहीं की जाती।
जब पुलिस की प्रेस रिलीज ही अंतिम सत्य बन जाए
लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि पत्रकार का काम सिर्फ सूचना देना नहीं, बल्कि सूचना की सत्यता परखना भी है।
आज अक्सर देखने को मिलता है कि किसी घटना के बाद पुलिस की प्रेस रिलीज जारी हुई और अगले ही घंटे वह खबर के रूप में प्रकाशित हो गई।
न सवाल… न पड़ताल… न वैकल्पिक दृष्टिकोण…
मानो प्रेस रिलीज ही न्यायालय का अंतिम फैसला हो।
ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है, क्योंकि उसे एक पक्ष की कहानी तो मिलती है, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं मिलती।
मीडिया की तालियां और सवालों का जनाजा
लोकतंत्र में मीडिया की पहचान उसकी तालियों से नहीं, उसके सवालों से होती है।
लेकिन आज का एक बड़ा संकट यह है कि कई मंचों पर सवाल पूछना जोखिम और प्रेस रिलीज प्रकाशित करना उपलब्धि समझा जाने लगा है।
सत्ता खुश… विभाग खुश… संस्थान खुश…
और सवाल?
वे अक्सर फाइलों में दफन हो जाते हैं।
जिस दिन मीडिया सवाल छोड़ देता है, उसी दिन लोकतंत्र की रीढ़ कमजोर होने लगती है।
मुठभेड़ सिर्फ जंगल में नहीं होती
अक्सर कहा जाता है कि मुठभेड़ जंगलों में होती है, जहां गोलियां चलती हैं। लेकिन लोकतंत्र में भी मुठभेड़ होती है।
फर्क सिर्फ इतना है—
जंगल में गोली पहले चलती है और लोकतंत्र में पहले तालियां बजती हैं।
जब मीडिया सवाल पूछना बंद कर देता है और सिर्फ सरकारी दावों का प्रसारक बन जाता है, तब लोकतंत्र के भीतर एक खतरनाक मुठभेड़ शुरू होती है।
यह मुठभेड़ होती है—
- सच और प्रचार के बीच
- सवाल और प्रशंसा के बीच
- पत्रकारिता और जनसंपर्क के बीच
दुर्भाग्य यह है कि कई बार इस मुठभेड़ में सवाल हार जाते हैं और प्रचार जीत जाता है।
प्राइवेट संस्थानों की चमक और खबरों का अंधेरा
निजी शिक्षण संस्थान हों, निजी अस्पताल हों या बड़े कारोबारी समूह— सभी अपनी सकारात्मक छवि बनाने के लिए प्रेस रिलीज जारी करते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है।
बुराई तब शुरू होती है जब प्रेस रिलीज और पत्रकारिता के बीच की रेखा मिटने लगती है।
क्योंकि प्रेस रिलीज का उद्देश्य संस्था का प्रचार होता है, जबकि पत्रकारिता का उद्देश्य जनता को सत्य बताना होता है।
यदि दोनों में अंतर समाप्त हो जाए तो खबर और विज्ञापन के बीच की दीवार भी गिर जाती है।
पत्रकारिता की असली परीक्षा
असली पत्रकारिता वही है जो प्रेस रिलीज पढ़कर यह पूछे—
- जो दावा किया गया है, क्या वह सही है?
- इसका दूसरा पक्ष क्या कहता है?
- इससे जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- आंकड़ों की वास्तविकता क्या है?
अगर ये सवाल नहीं पूछे जा रहे, तो फिर पत्रकारिता और जनसंपर्क में अंतर ढूंढना मुश्किल हो जाएगा।
निष्कर्ष: पत्रकारिता मरी नहीं, लेकिन वेंटिलेटर पर जरूर है
यह कहना गलत होगा कि पत्रकारिता पूरी तरह मर चुकी है। आज भी अनेक पत्रकार और संस्थान कठिन परिस्थितियों में निष्पक्ष रिपोर्टिंग कर रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि प्रेस रिलीज आधारित पत्रकारिता का चलन तेजी से बढ़ा है।
लोकतंत्र को मजबूत रखना है तो मीडिया को फिर से सवालों की तरफ लौटना होगा।
क्योंकि इतिहास गवाह है—
सत्ता को तालियां पसंद होती हैं, लेकिन समाज को सच चाहिए।
और जिस दिन मीडिया तालियों और सच के बीच चुनाव करना छोड़ देगा, उस दिन प्रेस रिलीज तो जिंदा रहेगी, लेकिन पत्रकारिता का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।
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