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बलिदान दिवस विशेष: झांसी की रानी के शरीर पर लगे घावों की वह कहानी, जो इतिहास की किताबों में कम मिलती है

बलिदान दिवस विशेष: जब सिर पर तलवार का वार हुआ, आंख बाहर निकल आई… फिर भी लड़ती रही झांसी की शेरनी

“खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी…”
विशेष प्रस्तुति: ओमप्रकाश चौहान, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
TargetTvLive Special Feature | 20 जून 2026

हाइलाइट्स

🔸 मात्र 29 वर्ष की आयु में मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।

🔸 अंतिम सांस तक अंग्रेजों से लड़ती रहीं झांसी की रानी।

🔸 गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद नहीं छोड़ी तलवार और घोड़े की लगाम।

🔸 आज भी साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की सबसे बड़ी मिसाल हैं महारानी लक्ष्मीबाई।

जिस वीरांगना ने मौत को भी चुनौती दी, उसका नाम था रानी लक्ष्मीबाई

भारत के इतिहास में कई वीरों और वीरांगनाओं ने जन्म लिया, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों बाद भी लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं। ऐसा ही एक नाम है महारानी लक्ष्मीबाई का।

झांसी की रानी केवल एक रानी नहीं थीं, बल्कि वह आजादी, साहस और स्वाभिमान की जीवित पहचान थीं। उन्होंने अंग्रेजों के सामने झुकने के बजाय लड़ते-लड़ते अपने प्राण न्योछावर करना स्वीकार किया। यही कारण है कि आज भी देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम गर्व से लेता है।

जब चारों ओर अंग्रेज थे और बीच में अकेली खड़ी थी झांसी की शेरनी

साल 1858 का वह दौर भारत के इतिहास का सबसे कठिन समय था। अंग्रेजी सेना लगातार आगे बढ़ रही थी। झांसी पर कब्जा करने के बाद अंग्रेज रानी लक्ष्मीबाई का पीछा कर रहे थे।

रणभूमि में चारों तरफ दुश्मन थे, लेकिन रानी के हौसले कमजोर नहीं पड़े।

युद्ध के दौरान एक अंग्रेज सैनिक ने गोली चलाई, जो रानी की बाईं जांघ में लगी। दर्द असहनीय था, खून लगातार बह रहा था, लेकिन रानी ने घोड़े की लगाम नहीं छोड़ी।

कहा जाता है कि जिस सैनिक ने उन पर गोली चलाई थी, रानी ने उसी क्षण अपनी तलवार से उसे मौत के घाट उतार दिया।

सिर पर हुआ भयानक वार, लेकिन नहीं टूटा हौसला

युद्ध अभी जारी था। तभी पीछे से एक अंग्रेज सैनिक ने रानी के सिर पर तलवार से जोरदार हमला किया।

वार इतना भयानक था कि उनके सिर का दाहिना हिस्सा गंभीर रूप से घायल हो गया और उनकी दाहिनी आंख बाहर निकल आई।

कल्पना कीजिए… एक महिला, जिसके शरीर से लगातार खून बह रहा हो, जो गंभीर रूप से घायल हो चुकी हो, वह क्या करती?

लेकिन यह कोई साधारण महिला नहीं थी।

यह झांसी की रानी थी।

इतिहास के वर्णनों के अनुसार, इतनी भयानक चोट के बाद भी उन्होंने अपनी आखिरी ताकत जुटाई और सामने खड़े दुश्मन पर तलवार से हमला कर उसे भी ढेर कर दिया।

आखिरी पल तक मातृभूमि की रक्षा करती रहीं

जब रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं, तब उनके पास न कोई राजसिंहासन था, न कोई महल।

उनके साथ थे केवल कुछ वफादार साथी और उनका दत्तक पुत्र दामोदर राव

कहा जाता है कि रानी नहीं चाहती थीं कि उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज उनके शरीर का अपमान करें। इसलिए उनके साथियों ने तुरंत उनका अंतिम संस्कार कर दिया।

यह केवल एक रानी की मृत्यु नहीं थी।

यह भारत माता की रक्षा के लिए दिया गया वह बलिदान था, जिसने आने वाली पीढ़ियों को आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।

इतिहास नहीं, प्रेरणा हैं लक्ष्मीबाई

महारानी लक्ष्मीबाई ने साबित कर दिया कि देशभक्ति किसी उम्र, पद या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती।

उन्होंने दिखाया कि जब बात मातृभूमि की रक्षा की हो, तो एक महिला भी पूरे साम्राज्य को चुनौती दे सकती है।

आज भी उनका जीवन हर भारतीय को अन्याय के खिलाफ खड़े होने, अपने अधिकारों की रक्षा करने और राष्ट्र को सर्वोपरि मानने की प्रेरणा देता है।

संक्षिप्त जीवन परिचय

नाम: मणिकर्णिका तांबे (महारानी लक्ष्मीबाई)
जन्म: 19 नवंबर 1828, वाराणसी
पति: महाराज गंगाधर राव नेवलकर
दत्तक पुत्र: दामोदर राव
वीरगति: 18 जून 1858, कोटा की सराय, ग्वालियर
आयु: मात्र 29 वर्ष

TargetTvLive की विशेष टिप्पणी

आजादी हमें विरासत में नहीं मिली, इसके लिए हजारों वीरों और वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। महारानी लक्ष्मीबाई उन महान योद्धाओं में सबसे अग्रणी थीं।

जब भी देशभक्ति, साहस और बलिदान की बात होगी, झांसी की रानी का नाम सबसे पहले लिया जाएगा।

बलिदान दिवस पर राष्ट्र उस अमर वीरांगना को श्रद्धापूर्वक नमन करता है, जिसने अपने लहू से इतिहास लिखा और आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्र भारत का सपना दिया।

“रानी लक्ष्मीबाई केवल इतिहास का अध्याय नहीं, भारत के स्वाभिमान की अमर पहचान हैं।”

— ओमप्रकाश चौहान
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
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