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सुप्रीम कोर्ट के आदेश बेअसर! अमरोहा में फुटपाथों पर दबंगों का कब्जा, जनता पर चालान और हादसों की दोहरी मार

फुटपाथों पर दबंगों का कब्जा, जनता सड़क पर बेबस! अमरोहा में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को खुली चुनौती

 

हाइलाइट्स

🔹 सरकारी फुटपाथों पर अवैध कब्जों से पैदल चलना हुआ मुश्किल।
🔹 छोटी दूरी के लिए भी लोग बाइक चलाने को मजबूर।
🔹 सड़क हादसों और भारी ट्रैफिक चालानों से जनता परेशान।
🔹 सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद नहीं हट रहे अतिक्रमण।
🔹 एसडीएम ने अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दिए संकेत।
🔹 सड़क सुरक्षा और पैदल यात्रियों के अधिकारों पर उठे गंभीर सवाल।

TargetTvLive | अमरोहा

अमरोहा में सरकारी फुटपाथों पर अवैध कब्जों का ऐसा जाल फैल चुका है कि अब पैदल चलना भी लोगों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। जिन फुटपाथों का निर्माण लोगों की सुविधा और सुरक्षा के लिए किया गया था, आज वे दबंगों और अतिक्रमणकारियों के कब्जे में हैं। कई स्थानों पर तो फुटपाथों को किराए पर दिए जाने तक की चर्चाएं हैं, जिससे आम नागरिकों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर प्रशासन ट्रैफिक नियमों के नाम पर दोपहिया वाहन चालकों के चालान काटकर लाखों रुपये का जुर्माना वसूल रहा है, वहीं दूसरी ओर लोगों को पैदल चलने के लिए सुरक्षित रास्ता तक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि जब फुटपाथ ही कब्जे में हैं तो आखिर लोग जाएं तो जाएं कहां?

फुटपाथ नहीं, इसलिए बाइक बनी मजबूरी

शहर के कई इलाकों में हालात ऐसे हैं कि कुछ सौ मीटर की दूरी तय करने के लिए भी लोग बाइक या स्कूटर निकालने को मजबूर हैं। कारण साफ है—फुटपाथ या तो पूरी तरह अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं या फिर उनका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क किनारे चलना जान जोखिम में डालने जैसा है। ऐसे में लोग वाहन का सहारा लेते हैं और फिर ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई का सामना करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग

सर्वोच्च न्यायालय कई बार साफ कर चुका है कि फुटपाथों पर सुरक्षित चलना हर नागरिक का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा है कि सड़कों पर पहला अधिकार पैदल यात्रियों का है और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त रखें।

लेकिन अमरोहा में हालात इसके बिल्कुल उलट दिखाई देते हैं। शहर के प्रमुख मार्गों और बाजारों में फुटपाथों पर कब्जा आम बात बन चुकी है। सवाल यह है कि जब अदालत के निर्देशों का पालन ही नहीं हो रहा तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

हादसे बढ़े, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा जान गंवाने वालों में दुपहिया वाहन चालक और पैदल यात्री शामिल हैं। इसके बावजूद शहरों में सुरक्षित फुटपाथों और पैदल यात्री सुविधाओं को प्राथमिकता नहीं मिल रही।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फुटपाथ व्यवस्थित और अतिक्रमण मुक्त हों तो सड़क हादसों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

एसडीएम ने दिखाई सख्ती

मामले को लेकर उपजिलाधिकारी शैलेश कुमार दूबे ने स्पष्ट कहा है कि गजरौला-चांदपुर स्टेट हाईवे-51, नेशनल हाईवे-09, कलाली रोड, धनौरा रोडवेज बस स्टैंड और अन्य प्रमुख स्थानों पर यदि फुटपाथों पर अवैध कब्जे पाए गए तो संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने संयुक्त टीम बनाकर विशेष अभियान चलाने और सरकारी फुटपाथों को पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देश भी दिए हैं।

जनता पूछ रही बड़ा सवाल

अमरोहा के लोग अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—”क्या कानून सिर्फ आम आदमी के लिए है?”

जब फुटपाथों पर कब्जा करने वाले खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, तब कार्रवाई का डंडा केवल वाहन चालकों पर ही क्यों चल रहा है? लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन वास्तव में सड़क सुरक्षा को लेकर गंभीर है तो सबसे पहले फुटपाथों को कब्जामुक्त कर पैदल यात्रियों को उनका अधिकार लौटाना होगा।

क्योंकि सुरक्षित फुटपाथ केवल सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार हैं। और जब अधिकार ही छिन जाएं, तो सड़क पर उतरने वाला हर व्यक्ति खतरे में होता है।

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