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“पत्रकारिता या फोटोशूट? वायरल तस्वीरों के दौर में कलम की परीक्षा”

फोटो में साहब, खबर में सन्नाटा! पत्रकारिता का नया मॉडल और कलम की घटती साख ?

जब सेल्फी बन गई पहचान, और खबरें हो गईं बैकग्राउंड में…
लेखक: अवनीश त्यागी

विशेष व्यंग्य: खबर गायब, साहब के साथ फोटो वायरल!

एक समय था जब पत्रकार की पहचान उसकी खबरों से होती थी। उसकी कलम की धार सत्ता के गलियारों तक सुनाई देती थी और उसके सवाल बड़े-बड़े अधिकारियों की नींद उड़ा देते थे। लेकिन डिजिटल युग की तेज़ रफ्तार में पत्रकारिता का एक नया संस्करण बाजार में उतर चुका है, जिसे आम बोलचाल में “फेसबुकिया पत्रकारिता” कहा जा सकता है।

इस नई पत्रकारिता का मूल मंत्र है—“खबर बाद में, फोटो पहले।”

आज कई तथाकथित पत्रकारों के सोशल मीडिया अकाउंट खोलकर देख लीजिए। वहां जनता की समस्याओं से ज्यादा अधिकारियों, नेताओं और रसूखदार लोगों के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों का संग्रहालय दिखाई देगा। मानो पत्रकारिता नहीं, बल्कि “सेल्फी प्रतियोगिता” चल रही हो।

फोटो जितनी बड़ी, उतना बड़ा प्रभाव?

आजकल कुछ लोगों ने पत्रकारिता को एक ऐसे विजिटिंग कार्ड में बदल दिया है, जिसे सरकारी दफ्तरों में दिखाकर प्रभाव जमाया जा सके।

किसी बड़े अधिकारी के साथ एक तस्वीर खिंचवा ली… फेसबुक पर पोस्ट कर दी… और फिर शुरू हो जाता है प्रभाव का प्रदर्शन।

स्थानीय स्तर पर संदेश दिया जाता है कि “देखिए, हमारी पहुंच कितनी ऊपर तक है।”

मजेदार बात यह है कि जिस तस्वीर को आम आदमी एक सामान्य औपचारिक मुलाकात समझता है, वही तस्वीर कुछ लोगों के लिए प्रभाव, दबाव और पहचान का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र बन जाती है।

खबर लिखने से ज्यादा जरूरी हो गया फ्रेम में आना

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता की आवाज़ बनना था। लेकिन अब कई जगहों पर ऐसा प्रतीत होता है कि खबरों की जगह फोटो ने ले ली है।

कभी किसी सड़क की बदहाली पर रिपोर्ट नहीं दिखेगी। किसी अस्पताल की लापरवाही पर सवाल नहीं दिखेंगे। किसी किसान की परेशानी या बेरोजगार युवा की कहानी शायद ही नजर आए।

लेकिन जैसे ही कोई अधिकारी जिले में आया, कैमरे चमक उठते हैं और अगले कुछ मिनटों में सोशल मीडिया पर दर्जनों तस्वीरें दिखाई देने लगती हैं।

खबर का स्थान धीरे-धीरे “मैं और साहब” श्रृंखला ने ले लिया है।

साहब भी परेशान, पत्रकार भी खुश

व्यंग्य की दृष्टि से देखें तो इस व्यवस्था में सबसे असहज स्थिति कई बार अधिकारियों की भी होती है।

अधिकारी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचे नहीं कि चारों तरफ मोबाइल कैमरों का घेरा बन जाता है। एक फोटो इधर, एक सेल्फी उधर, एक वीडियो इधर…

साहब सोचते हैं कि कार्यक्रम कब शुरू होगा, और कुछ लोग सोचते हैं कि फोटो कब वायरल होगी।

कई बार ऐसा लगता है जैसे कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जनहित नहीं, बल्कि सोशल मीडिया सामग्री तैयार करना रह गया हो।

अब भी जिंदा हैं कलम के सच्चे सिपाही

हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू उम्मीद जगाने वाला है।

आज भी ऐसे पत्रकार मौजूद हैं जो बिना किसी प्रचार के गांव-गांव घूमकर समस्याएं उठाते हैं। जो किसी नेता या अधिकारी के साथ फोटो लगाने से ज्यादा महत्व एक सटीक और तथ्यपूर्ण खबर को देते हैं।

ये वे लोग हैं जिनकी खबरें पढ़कर व्यवस्था हरकत में आती है।

इनके लिए पत्रकारिता लाइक, कमेंट और शेयर का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है।

इनकी पहचान किसी वीआईपी के साथ फोटो नहीं, बल्कि जनता के बीच विश्वसनीयता होती है।

सोशल मीडिया ने बदली पत्रकारिता की परिभाषा

डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ दिखावे की संस्कृति भी बढ़ी है।

अब अक्सर योग्यता का आकलन इस आधार पर होने लगा है कि किसके पास कितने फॉलोअर्स हैं, किसकी पोस्ट पर कितने लाइक आए और किसने किस बड़े अधिकारी के साथ फोटो साझा की।

दुर्भाग्य यह है कि कई बार खबर की गुणवत्ता इन चमकदार तस्वीरों के पीछे छिप जाती है।

व्यंग्य का निष्कर्ष

बड़ा अजीब दौर है साहिब…

पहले पत्रकार अधिकारी से सवाल पूछता था, अब कई लोग अधिकारी के साथ फोटो पोस्ट करते हैं।

पहले खबर वायरल होती थी, अब तस्वीर वायरल होती है।

पहले कलम से पहचान बनती थी, अब कैमरे के एंगल से।

लेकिन सच आज भी वही है—

सम्मान फोटो से नहीं, चरित्र से मिलता है। विश्वसनीयता लाइक्स से नहीं, निष्पक्ष खबरों से बनती है। और पत्रकारिता की असली ताकत किसी साहब के कंधे पर रखा हाथ नहीं, बल्कि जनता के हित में उठाई गई कलम होती है।

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