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“पत्रकार कम, भाट ज्यादा!” — मीडिया की गिरती साख पर बड़ा खुलासा

“पत्रकार कम, भाट ज्यादा!” — मीडिया की गिरती साख पर बड़ा खुलासा

सवाल पूछने वाले पत्रकार कम क्यों हो रहे हैं? आखिर किसके दबाव में घुट रही है सच की आवाज?

 By Avnish Tyagi | TargetTvLive

 पत्रकारिता दिवस हर साल आता है। बधाइयां दी जाती हैं, बड़े-बड़े भाषण होते हैं, मीडिया की आज़ादी पर चर्चाएं होती हैं। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल आज भी अधूरा खड़ा दिखाई देता है—क्या देश में पत्रकारिता सच में आज़ाद है?

यह सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि आज आम आदमी के मन में भी यह बात घर करने लगी है कि अब पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रही। पहले पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था, जनता की आवाज बनता था और सच को सामने लाने के लिए किसी भी हद तक जाने का साहस रखता था। लेकिन आज हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। अब बहुत कम लोग ऐसे नजर आते हैं जो सत्ता, सिस्टम और ताकतवर लोगों के सामने खुलकर सच बोलने की हिम्मत रखते हों।

 पत्रकार का सबसे बड़ा हथियार “सवाल” होता है

एक सच्चे पत्रकार की पहचान उसकी कलम और उसके सवालों से होती है। पत्रकार अगर सवाल पूछना छोड़ दे, तो फिर पत्रकारिता केवल दिखावा बनकर रह जाती है।

सवाल पूछना किसी पत्रकार की बदतमीजी नहीं, बल्कि उसका संवैधानिक और नैतिक अधिकार है। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होती है और पत्रकार उसी जवाबदेही को जनता तक पहुंचाने का काम करता है।

लेकिन आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि सवाल पूछने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। वजह साफ है—डर, दबाव, निजी स्वार्थ और सुविधाओं की लालसा।

सच दिखाने की कीमत हमेशा भारी रही है

इतिहास उठाकर देख लीजिए, जिसने भी सच बोलने की कोशिश की उसे विरोध, दबाव और संघर्ष का सामना करना पड़ा। पत्रकारिता भी इससे अलग नहीं है।

जो पत्रकार सच दिखाता है, वह कई बार सत्ता, प्रशासन, प्रभावशाली लोगों और यहां तक कि अपने ही लोगों के निशाने पर आ जाता है। लेकिन फिर भी वही पत्रकार असली पत्रकार कहलाने का हकदार होता है, जो डर के आगे झुकने के बजाय सच के साथ खड़ा रहे।

क्योंकि पत्रकारिता आरामदायक कुर्सी पर बैठकर सत्ता की तारीफ करने का नाम नहीं है। पत्रकारिता जनता के दर्द को आवाज देने का नाम है।

 सबसे बड़ा खतरा बाहर नहीं, भीतर पैदा हो चुका है

आज पत्रकारिता को जितना खतरा किसी सरकार या सत्ता से नहीं है, उससे कहीं ज्यादा खतरा उन लोगों से है जिन्होंने पत्रकारिता को निजी फायदे का जरिया बना लिया है।

कुछ लोग पत्रकारिता को मिशन नहीं, बल्कि “सेटिंग” और “प्रबंधन” का माध्यम बना चुके हैं। यही वजह है कि अब जनता के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि पत्रकार कम और “भाट-चारण” ज्यादा पैदा हो चुके हैं।

जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसकी वाहवाही में लग जाए, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। क्योंकि उस स्थिति में जनता की आवाज दबने लगती है।

 निजी हित खत्म किए बिना नहीं बचेगी निष्पक्ष पत्रकारिता

सच्चाई यही है कि जब तक पत्रकार अपने निजी स्वार्थों से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद करना मुश्किल है।

अगर पत्रकार का उद्देश्य केवल पहचान, पहुंच, लाभ या सुविधा हासिल करना बन जाएगा, तो फिर उसकी कलम कभी खुलकर सच नहीं लिख पाएगी।

निडर पत्रकारिता त्याग मांगती है। संघर्ष मांगती है। कई बार अपमान, विरोध और अकेलापन भी झेलना पड़ता है। लेकिन इतिहास उन्हीं लोगों को याद रखता है जिन्होंने सच के लिए लड़ने का साहस दिखाया।

 पत्रकार संगठनों पर भी उठ रहे गंभीर सवाल

आज जब पत्रकारों पर हमले बढ़ रहे हैं, मुकदमे दर्ज हो रहे हैं और दबाव बनाया जा रहा है, तब पत्रकार संगठनों की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या ये संगठन वास्तव में पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं?
क्या वे सच बोलने वालों के साथ मजबूती से खड़े हैं?
या फिर वे भी केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं?

अगर पत्रकार अकेला पड़ जाएगा, तो सत्ता के सामने उसकी आवाज कमजोर हो जाएगी। इसलिए पत्रकारों की एकजुटता और निष्पक्षता दोनों बेहद जरूरी हैं।

 कलम में ताकत होगी, तभी आज़ादी मिलेगी

दुनिया हमेशा ताकत के आगे झुकी है। लेकिन पत्रकार की असली ताकत उसकी कलम, उसका साहस और उसकी सच्चाई होती है।

जिस दिन पत्रकार डरना छोड़ देगा…
जिस दिन वह सत्ता के सामने सीना तानकर सवाल पूछेगा…
जिस दिन वह निजी फायदे से ऊपर उठकर जनहित को प्राथमिकता देगा…
उसी दिन प्रेस की वास्तविक आज़ादी मजबूत होगी।

क्योंकि स्वतंत्रता मांगी नहीं जाती, उसे साहस और संघर्ष से हासिल किया जाता है।

 निष्कर्ष

प्रेस स्वतंत्रता दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा को पहचानने का दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल नौकरी या व्यवसाय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का सबसे बड़ा माध्यम है।

अगर पत्रकार सच बोलना छोड़ देगा, तो समाज अंधेरे में चला जाएगा।
लेकिन अगर पत्रकार अपनी कलम को सच और जनता के लिए समर्पित कर दे, तो कोई भी ताकत लोकतंत्र की आवाज को दबा नहीं सकती।

लेख: अवनीश त्यागी
 प्रस्तुतकर्ता: TargetTvLive
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