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बिजनौर से उठा मुद्दा, राष्ट्रपति तक पहुंचा विरोध—क्रिकेट डील पर बड़ा सवाल

बिजनौर से उठा मुद्दा, राष्ट्रपति तक पहुंचा विरोध—क्रिकेट डील पर बड़ा सवाल

क्रिकेट लीग में विदेशी खिलाड़ियों की खरीद पर उठे सवाल, संगठन ने राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन

बिजनौर | विशेष रिपोर्टअवनीश त्यागी 

दुनिया भर में फ्रेंचाइजी आधारित क्रिकेट लीग का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। इन लीगों में खिलाड़ी देश की सीमाओं से परे जाकर विभिन्न टीमों के लिए खेलते हैं। लेकिन जब खेल के मैदान से जुड़ा कोई फैसला राजनीतिक या भावनात्मक मुद्दे से टकरा जाता है, तो विवाद खड़ा होना तय माना जाता है।

हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसमें एक पाकिस्तानी खिलाड़ी को करोड़ों रुपये में टीम में शामिल किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर एक संगठन ने देश की राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। यह मामला अब खेल और राजनीति के बीच चल रही पुरानी बहस को फिर से चर्चा में ले आया है।

फ्रेंचाइजी क्रिकेट लीग का बढ़ता प्रभाव

पिछले डेढ़ दशक में क्रिकेट की दुनिया में सबसे बड़ा बदलाव फ्रेंचाइजी लीगों के रूप में सामने आया है। भारत की Indian Premier League (आईपीएल) ने क्रिकेट के कारोबार, खिलाड़ियों की कमाई और खेल के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया।

आईपीएल की सफलता के बाद दुनिया के कई देशों ने भी अपनी लीग शुरू कर दीं। इसी कड़ी में इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने The Hundred नाम की नई क्रिकेट लीग शुरू की। यह लीग 100 गेंदों के अनोखे फॉर्मेट में खेली जाती है और इसमें भी दुनिया भर के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं।

इन लीगों की खास बात यह है कि टीम मालिक खिलाड़ी की राष्ट्रीयता के बजाय उसकी प्रतिभा और बाजार मूल्य को देखते हैं। यही कारण है कि कई बार अलग-अलग देशों के खिलाड़ी एक ही टीम में साथ खेलते दिखाई देते हैं।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

हालिया विवाद की जड़ में एक पाकिस्तानी खिलाड़ी को करोड़ों रुपये में टीम में शामिल किए जाने की खबर है। इस खबर के सामने आने के बाद कुछ संगठनों ने आपत्ति जताई और इसे देश की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बताया।

बिजनौर में एक संगठन के पदाधिकारियों ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भेजते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों को देखते हुए ऐसे फैसलों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया कि संबंधित खिलाड़ी ने पहले भारत के खिलाफ बयान दिए थे।

भारत-पाकिस्तान संबंध और खेल

भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध लंबे समय से संवेदनशील रहे हैं। इसका असर खेल जगत पर भी पड़ता रहा है।

दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज कई सालों से बंद है। दोनों टीमें आम तौर पर केवल आईसीसी टूर्नामेंट या एशिया कप जैसे आयोजनों में ही आमने-सामने आती हैं।

ऐसे में जब किसी लीग में पाकिस्तान से जुड़े खिलाड़ी या उनसे संबंधित मुद्दा सामने आता है तो वह जल्दी ही भावनात्मक बहस का रूप ले लेता है।

पुलवामा हमले के बाद बदला माहौल

2019 में हुए Pulwama Attack के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव और बढ़ गया था। इस हमले में भारतीय सुरक्षाबलों के कई जवान शहीद हुए थे, जिसके बाद देशभर में आक्रोश देखने को मिला।

उसी समय भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर Abhinandan Varthaman का मामला भी चर्चा में रहा, जब पाकिस्तान ने उन्हें पकड़ लिया था और बाद में अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद रिहा किया गया।

इन घटनाओं के बाद खेल और मनोरंजन के क्षेत्र में भी पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ गई।

खेल और राजनीति: अलग या साथ?

विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि खेल को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए या नहीं।

खेल को राजनीति से अलग रखने के पक्ष में तर्क

  • खेल अंतरराष्ट्रीय भाईचारे को बढ़ाता है
  • खिलाड़ियों को राजनीति से दूर रखना चाहिए
  • लीग का उद्देश्य मनोरंजन और प्रतिस्पर्धा है

विरोध करने वालों के तर्क

  • राष्ट्रीय भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
  • खिलाड़ियों के बयान या गतिविधियां विवाद का कारण बन सकती हैं
  • राजनीतिक माहौल का असर खेल पर पड़ता ही है

यही वजह है कि हर बार ऐसा कोई मुद्दा सामने आने पर समाज में अलग-अलग राय देखने को मिलती है।

सोशल मीडिया पर भी दो धड़े

इस मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है।

कुछ लोग इसे खेल का सामान्य हिस्सा बता रहे हैं और कह रहे हैं कि खिलाड़ियों को उनकी प्रतिभा के आधार पर देखा जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि जब मामला राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा हो तो ऐसे फैसलों पर पुनर्विचार होना चाहिए।

क्या हो सकता है आगे?

फिलहाल यह मामला एक ज्ञापन और विरोध तक सीमित है। लेकिन अगर यह विवाद और बढ़ता है तो संबंधित लीग और टीम मालिकों पर दबाव बढ़ सकता है।

संभव है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर लीग आयोजकों, फ्रेंचाइजी मालिकों या संबंधित संस्थाओं की प्रतिक्रिया सामने आए।

निष्कर्ष: खेल से बड़ा बनता जा रहा विवाद

यह मामला केवल एक खिलाड़ी की खरीद या एक लीग तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक बहस को भी सामने लाता है कि आज के दौर में खेल, राजनीति और राष्ट्रीय भावनाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल में जब भी ऐसे विवाद सामने आते हैं, तो वे केवल मैदान तक सीमित नहीं रहते बल्कि समाज और राजनीति में भी चर्चा का विषय बन जाते हैं।

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