योगी सरकार की नीतियों पर ‘ब्यूरोक्रेसी का ब्रेक’? पत्रकार उत्पीड़न, भू-माफिया नेक्सस और फर्जी निस्तारण पर उठे बड़े सवाल
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री Yogi Adityanath की सरकार अपनी जीरो टॉलरेंस नीति और सुशासन मॉडल को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही है। “भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश और भयमुक्त समाज” के संकल्प के साथ सरकार लगातार प्रशासनिक सुधारों और जनहितकारी योजनाओं को लागू कर रही है।
हालांकि, हाल ही में भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल की एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ने जिला स्तर पर प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संगठन के संस्थापक एवं संपादक ए.के. बिंदुसार का दावा है कि कई जिलों में नौकरशाही का एक हिस्सा सरकार की मंशा के विपरीत काम करते हुए न केवल शासन को गुमराह कर रहा है, बल्कि सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
पत्रकारों पर दबाव और माफिया से गठजोड़ का आरोप
रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के कई जिलों—जैसे वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, चंदौली, गाजीपुर, बलिया, उन्नाव, एटा और कानपुर—से ऐसे मामलों की जानकारी सामने आई है जहां भ्रष्टाचार या भू-माफिया के खिलाफ खबरें प्रकाशित करने वाले पत्रकारों को ही प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ा।
संगठन का आरोप है कि कई मामलों में अपराधियों पर कार्रवाई के बजाय पत्रकारों पर ही फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए।
ए.के. बिंदुसार के अनुसार,
“यदि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो सुशासन का दावा कमजोर पड़ जाएगा। कुछ अधिकारी माफियाओं के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं।”
तहसील और थाना दिवस: ‘समाधान’ या कागजी कार्रवाई?
प्रदेश में आम जनता की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए तहसील दिवस और थाना दिवस जैसी व्यवस्था लागू की गई है। लेकिन रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कई जिलों में यह व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
- शिकायतों का मौके पर निस्तारण किए बिना ही पोर्टल पर निस्तारित दिखाना
- शिकायतकर्ताओं को दबाव या धमकी देकर चुप कराने के आरोप
- वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट लखनऊ तक न पहुंचने देना
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह शासन की ई-गवर्नेंस प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर सकता है।
भू-माफिया और प्रशासनिक संरक्षण का आरोप
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लखनऊ के आसपास के क्षेत्रों और एनसीआर से जुड़े जिलों में भू-माफिया सक्रिय हैं। आरोप है कि कुछ प्रशासनिक अधिकारी गलत रिपोर्ट देकर इन मामलों में सख्त कार्रवाई को रोक रहे हैं।
प्रदेश सरकार की सख्त कार्रवाई—जिसे आमतौर पर “बुलडोजर नीति” के रूप में जाना जाता है—को भी कथित तौर पर कई मामलों में प्रशासनिक स्तर पर धीमा या रोकने की कोशिश की जा रही है।
महिला सुरक्षा और युवा योजनाओं पर भी सवाल
प्रदेश सरकार की मिशन शक्ति और युवाओं के स्वावलंबन से जुड़ी योजनाएं बड़े स्तर पर चलाई जा रही हैं। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, कई जिलों में इन योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रशासनिक सुस्ती देखने को मिल रही है।
विशेषकर महिला उत्पीड़न के मामलों में तत्काल कार्रवाई के आदेशों का पालन नहीं होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
“भीतरघात कर रही है नौकरशाही”
भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी का मानना है कि यदि इन मामलों की स्वतंत्र और गोपनीय जांच नहीं कराई गई तो इससे सरकार और जनता के बीच विश्वास की खाई गहरी हो सकती है।
संगठन का कहना है कि इंटेलिजेंस एजेंसियों और स्वतंत्र मीडिया संगठनों के माध्यम से जिला प्रशासन की कार्यशैली की समीक्षा कराई जानी चाहिए।
बिंदुसार का कहना है:
“सरकार की मंशा साफ है, लेकिन कुछ अधिकारी सरकार और जनता के बीच अविश्वास पैदा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के आदेश फाइलों में सुरक्षित हैं, लेकिन जिलों में उनका प्रभाव कमजोर पड़ रहा है।”
संगठन की प्रमुख मांगें
रिपोर्ट में सरकार से तीन प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
- पत्रकार सुरक्षा कानून लागू हो – भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा मिले।
- जवाबदेही तय हो – गलत निस्तारण या प्रशासनिक लापरवाही पर जिलाधिकारियों सहित संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई।
- स्वतंत्र जांच आयोग का गठन – भू-माफिया और प्रशासनिक गठजोड़ की जांच के लिए।
उत्तर प्रदेश सरकार की सुशासन और भ्रष्टाचार विरोधी नीतियां राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं। ऐसे में जिला स्तर पर प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर उठे ये आरोप शासन के लिए गंभीर संकेत माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई होती है, तो इससे सरकार की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों मजबूत हो सकती हैं।
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