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जब पानी ही बन जाए रंग और जहर—अमरोहा के गांवों की दर्दनाक कहानी

होली से पहले अमरोहा में जल संकट विस्फोट—धरने में महिलाओं की बड़ी भागीदारी

 

अमरोहा, 2 मार्च। फागुन की रंगीनियों के बीच जनपद के गजरौला-नाईपुरा क्षेत्र से एक गंभीर और विडंबनापूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। हैंडपंपों से निकल रहे कथित रूप से दूषित और रंग-बिरंगे पानी को लेकर किसानों ने प्रशासन पर तीखा तंज कसते हुए इसे “कैमिकली होली” करार दिया है। उनका आरोप है कि औद्योगिक अपशिष्ट के कारण पानी का रंग और गंध बदल चुकी है, लेकिन जिला प्रशासन ने अब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है।

‘विकास’ बनाम ‘विषाक्त जल’: किसानों का व्यंग्यात्मक हमला

धरना स्थल पर किसानों ने कहा कि “इस बार होली के लिए अलग से रंग खरीदने की जरूरत नहीं, हैंडपंप से ही पीला, हरा, नीला और बदबूदार ‘फ्री मिक्सचर’ मिल रहा है।” यह बयान क्षेत्र में बढ़ती जल-प्रदूषण की आशंकाओं और प्रशासनिक निष्क्रियता पर सीधा कटाक्ष माना जा रहा है।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट ने भूजल को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा, “विकास का रंग इतना गहरा है कि अब पानी में केमिकल का कॉकटेल फ्री में मिल रहा है। बस हैंडपंप चलाइए और ‘होली खेलिए’।”

72 दिन से जारी धरना: महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

शहबाजपुर डोर क्षेत्र में चल रहा धरना सोमवार को 72वें दिन में प्रवेश कर गया। ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरकर पहुंचीं महिलाओं ने साफ कहा, “घर में शुद्ध पानी नहीं बचा, तो घर बैठने से बेहतर है धरने पर बैठकर इंसाफ मांगें।”

धरना स्थल पर विमला, कैलाशो, ओमवती, राजमणि, मुनेश, दयावती, सूरज, गुड्डी कौर, सोमती, बीरा, कश्मीरी, कृष्णा, सीमा, कुसुम, संतोष, ओमप्रकाश, फिरोज़ चौधरी, ज्ञान सिंह, राम प्रसाद, विजय सिंह, समरपाल, गंगाराम, सतीराम, रामफल, मंसूर अली, पप्पू, विजय, अंकित, नूरजहाँ, अहद अली, चंद्रपाल सिंह सहित विभिन्न गांवों से आए किसान मौजूद रहे।

‘रिपोर्ट क्लासिफाइड क्यों?’—प्रशासन से सवाल

किसानों का कहना है कि यदि पानी सुरक्षित है तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान और एहसान अली (अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी) ने कहा, “अन्नदाता 72 दिन से धरने पर है, लेकिन कार्रवाई शून्य है। पानी हरा, लोग पीले, फसलें काली—क्या यही औद्योगिक विकास है?”

किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र की बगद नदी में औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ा जा रहा है, जिससे आसपास के गांवों का भूजल प्रभावित हो रहा है। हालांकि प्रशासन की ओर से इस पर अब तक कोई औपचारिक पुष्टि या विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।

स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा

ग्रामीणों का दावा है कि दूषित पानी के सेवन से त्वचा रोग, पेट संबंधी समस्याएं और अन्य गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। कुछ किसानों ने इसे “साइलेंट किलर” तक बताया। हालांकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से आधिकारिक आंकड़े सामने नहीं आए हैं, जिससे आशंकाएं और गहरी हो रही हैं।

राजनीतिक तापमान भी बढ़ा

धरने के 72 दिन पूरे होने के साथ ही मुद्दा राजनीतिक रंग भी लेता दिख रहा है। किसानों ने आरोप लगाया कि चुनावी मौसम में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन मूलभूत जरूरत—शुद्ध पानी—पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते।

प्रशासन की भूमिका और आगे का रास्ता

जिला प्रशासन की ओर से फिलहाल औपचारिक बयान की प्रतीक्षा है। यदि भूजल में औद्योगिक रसायनों की पुष्टि होती है, तो यह न केवल पर्यावरणीय बल्कि जनस्वास्थ्य आपदा का मामला बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • स्वतंत्र लैब से पानी की जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
  • प्रभावित गांवों में टैंकर से शुद्ध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित हो
  • प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कड़ी कार्रवाई हो
  • स्वास्थ्य शिविर लगाकर ग्रामीणों की जांच कराई जाए

निष्कर्ष: रंगों की नहीं, इंसाफ की होली?

फागुन की विदाई और होली के स्वागत के बीच गजरौला-नाईपुरा के किसानों का यह आंदोलन प्रतीक बन गया है—रंगों की जगह पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग का।

प्रकृति जहां सुनहरी सरसों और ओस भरी हवाओं से संदेश दे रही है कि “जो झुकता है वही पकता है”, वहीं किसान साफ कह रहे हैं—अब झुकना नहीं, जब तक शुद्ध पानी और न्याय नहीं मिलता।

यह होली सामान्य नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और पर्यावरणीय जवाबदेही की परीक्षा बनती जा रही है।

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