अमरोहा में ‘जहरीली फैक्ट्री बनाम जिंदगी’ की जंग: 70 दिन से धरने पर किसान, बगद नदी-भूजल प्रदूषण पर बड़ा खुलासा कब?
गजरौला-नाईपुरा में रासायनिक अपशिष्ट से पानी-हवा पर संकट, भाकियू का प्रशासन पर सीधा आरोप—“जांच रिपोर्ट दबाने की कोशिश?”
डिजिटल डेस्क | अमरोहा | 28 फरवरी 2026
अमरोहा जिले के गजरौला-नाईपुरा क्षेत्र में रासायनिक कारखानों से निकलने वाले कथित जहरीले अपशिष्ट को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा उबाल पर है। बगद नदी और भूजल के गंभीर रूप से दूषित होने के आरोपों के बीच शहबाजपुर डोर में किसानों का धरना 70वें दिन भी जारी रहा। आंदोलन को अब क्षेत्रीय किसान संगठनों का व्यापक समर्थन मिल रहा है, जिससे प्रशासन पर पारदर्शी कार्रवाई का दबाव बढ़ता जा रहा है।
ट्रैक्टर-ट्रॉली में उमड़ा जनसमर्थन, आंदोलन को मिला नया बल
तहसील हसनपुर क्षेत्र के गांव कबीरपुर से किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर धरना स्थल पहुंचे। मंच से ऐलान हुआ कि यदि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई और जिम्मेदार उद्योगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन तेज किया जाएगा।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा, “संस्थागत भ्रष्टाचार और संगठित अपराध का डीएनए एक जैसा है। जांच में देरी भरोसा तोड़ती है।”
बगद नदी और भूजल पर ‘जहर’ का साया
ग्रामीणों का आरोप है कि नाईपुरा क्षेत्र की रासायनिक इकाइयों से निकलने वाला अपशिष्ट जल स्रोतों में मिल रहा है। इसके संभावित प्रभाव:
- बगद नदी का जल रंग/गंध में बदलाव
- हैंडपंप-ट्यूबवेल का पानी संदिग्ध
- फसलों की पैदावार में गिरावट
- पशुधन की सेहत पर असर
- त्वचा/श्वसन संबंधी शिकायतों में वृद्धि
किसान नेताओं का कहना है कि “कथित विकास” ने गांव की मिट्टी की प्राकृतिक सुगंध छीन ली है।
PM2.5 और मानसिक स्वास्थ्य: डिमेंशिया-अल्जाइमर का बढ़ता खतरा?
प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का हवाला देते हुए दावा किया कि PM2.5 के हर 10 माइक्रोग्राम/घन मीटर बढ़ने से डिमेंशिया का जोखिम 40% और अल्जाइमर का 47% तक बढ़ सकता है।
गजरौला क्षेत्र में वायु गुणवत्ता को लेकर चिंताएं पहले भी उठती रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार उच्च PM2.5 स्तर से:
- दिमाग में सूजन (Neuroinflammation)
- ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस
- याददाश्त में कमी
- बुजुर्गों में डिमेंशिया का जोखिम
बढ़ सकता है। प्रदूषण नियंत्रण को मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
प्रशासन की पहल: जांच कमेटी गठित, रिपोर्ट पर नजर
जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स ने दूषित जल-मिट्टी की जांच के लिए कमेटी गठित की है। किसान संगठनों की मांग है कि:
- जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
- जिम्मेदार उद्योगों पर दंडात्मक कार्रवाई हो
- प्रभावित परिवारों को मुआवजा मिले
- दीर्घकालिक स्वास्थ्य सर्वे कराया जाए
जब तक ये कदम नहीं उठते, धरना जारी रखने की घोषणा की गई है।
विकास मॉडल पर वैचारिक बहस
नरेश चौधरी ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि 1750 के आसपास भारत विश्व जीडीपी का बड़ा हिस्सा रखता था, जब स्थानीय समुदायों की भूमिका मजबूत थी। उन्होंने मौजूदा विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए कहा कि “नीतियां पूंजीपतियों के हितों तक सीमित हो रही हैं, जबकि ग्रामीण समाज और प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी हो रही है।”
MSP और ‘रेवड़ी कल्चर’ पर सियासी तकरार
धरने के मंच से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग भी दोहराई गई। साथ ही “रेवड़ी कल्चर” और कथित गुमराह राजनीति पर भी तीखी टिप्पणी की गई। आंदोलन अब पर्यावरण, कृषि नीति और प्रशासनिक जवाबदेही—तीनों मुद्दों का संगम बनता जा रहा है।
आगे क्या?
- क्या जांच रिपोर्ट समयबद्ध तरीके से सार्वजनिक होगी?
- क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वतंत्र ऑडिट कराएगा?
- क्या उद्योगों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगेगी?
- क्या स्वास्थ्य विभाग व्यापक स्क्रीनिंग शुरू करेगा?
यह मुद्दा अब केवल नदी या भूजल तक सीमित नहीं—यह ग्रामीण जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और विकास बनाम पर्यावरण संतुलन की बहस का केंद्र बन चुका है।
निष्कर्ष
अमरोहा का गजरौला-नाईपुरा विवाद दिखाता है कि औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय जवाबदेही के बीच संतुलन बिगड़ने पर सामाजिक तनाव कितना गहरा हो सकता है। यदि पारदर्शिता और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आंदोलन व्यापक जनांदोलन का रूप ले सकता है।
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