‘अब या तो न्याय होगा या क्रांति’ – गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने के लिए पूर्व IAS का महाअनशन ऐलान, 8 मार्च से देहरादून में आर-पार की लड़ाई
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📍 नई दिल्ली/देहरादून
उत्तराखंड की स्थाई राजधानी गैरसैंण बनाए जाने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर गूंज उठी है। राजधानी दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक अहम प्रेस वार्ता में उत्तराखंड शासन के पूर्व सचिव और आईएएस अधिकारी विनोद प्रसाद रतूड़ी ने 8 मार्च 2026 से देहरादून में महाअनशन शुरू करने का ऐलान कर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
रतूड़ी ने स्पष्ट शब्दों में कहा – “न शासन में दबे थे, न अब दबेंगे। अब या तो न्याय होगा या क्रांति।”
गैरसैंण की लड़ाई: आंदोलन होगा तेज
स्थाई राजधानी गैरसैंण समिति के मुख्य संयोजक रतूड़ी ने कहा कि 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी राज्य को स्थाई राजधानी न मिलना उत्तराखंड की अस्मिता और 42 शहीदों के बलिदान का अपमान है।
उन्होंने घोषणा की कि 8 मार्च से देहरादून में अनिश्चितकालीन क्रमिक अनशन शुरू किया जाएगा। यह आंदोलन केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि आर-पार की लड़ाई होगा।
क्यों अहम है गैरसैंण?
उत्तराखंड गठन के समय से ही पहाड़ की भौगोलिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक दृष्टि से गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग उठती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- गैरसैंण भौगोलिक रूप से कुमाऊं और गढ़वाल के मध्य स्थित है
- पहाड़ी क्षेत्रों के संतुलित विकास के लिए उपयुक्त
- राज्य आंदोलन की मूल भावना से जुड़ा केंद्र
हालांकि फिलहाल देहरादून प्रशासनिक राजधानी है, जबकि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है।
हाईकोर्ट जाने की चेतावनी
रतूड़ी ने सरकार को चेताते हुए कहा कि यदि जनभावनाओं की अनदेखी जारी रही तो वे जल्द ही उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। उनका आरोप है कि लगातार वादाखिलाफी और राजनीतिक टालमटोल से राज्य की आत्मा आहत हो रही है।
उन्होंने अपने सेवाकाल का जिक्र करते हुए बताया कि गैरसैंण के समर्थन में आवाज उठाने की कीमत उन्हें 48 से अधिक तबादलों के रूप में चुकानी पड़ी, लेकिन वे कभी दबे नहीं।
प्रेस वार्ता में ये रहे मौजूद
प्रेस वार्ता में अधिवक्ता भुवन चंद जुयाल, राजेंद्र कंडवाल, देवेन्द्र रतूड़ी, दान सिंह मिंगवाल और जसपाल सिंह रावत ने भी आंदोलन की रूपरेखा साझा की और राज्यव्यापी जनजागरण अभियान का ऐलान किया।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या सरकार पर बढ़ेगा दबाव?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:
- 2026 का यह आंदोलन आगामी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है
- पहाड़ बनाम मैदान की बहस फिर तेज हो सकती है
- क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा व्यापक जनसमर्थन जुटा सकता है
यदि आंदोलन लंबा खिंचता है तो सरकार के लिए इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
आगे क्या?
- 8 मार्च 2026 से देहरादून में महाअनशन
- राज्यव्यापी जनसमर्थन अभियान
- उच्च न्यायालय में संभावित याचिका
- जनप्रतिनिधियों का सार्वजनिक घेराव
रतूड़ी का दावा है कि यह केवल एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं, बल्कि हर उत्तराखंडी के स्वाभिमान की लड़ाई है।
निष्कर्ष
गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। सवाल यह है कि क्या सरकार इस बार आंदोलन को गंभीरता से लेगी या फिर उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होगा?
आने वाले दिन राज्य की दिशा और दशा तय कर सकते हैं।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए जुड़े रहें।
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