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बिजनौर: मतदाता सूची शुद्धिकरण अभियान तेज, अनमेप्ड मतदाताओं पर निर्वाचन आयोग की सख्ती

बिजनौर: मतदाता सूची शुद्धिकरण अभियान तेज, अनमेप्ड मतदाताओं पर निर्वाचन आयोग की सख्ती

रिपोर्ट अवनीश त्यागी

बिजनौर, 23 जनवरी 2026।
विधानसभा क्षेत्र नहटौर में चल रहा विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सीधा हस्तक्षेप माना जा रहा है। उप जिला निर्वाचन अधिकारी/अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) वान्या सिंह द्वारा नगर पालिका हल्दौर एवं खंड शिक्षा अधिकारी हल्दौर कार्यालय में अनमेप्ड (अमानित) मतदाताओं की सुनवाई का विस्तृत निरीक्षण इसी दिशा में एक अहम कदम है।

क्यों जरूरी है अनमेप्ड मतदाताओं की सुनवाई?

अनमेप्ड या अमानित मतदाता वे होते हैं, जिनका नाम मतदाता सूची में तो दर्ज होता है, लेकिन उनका पता, पहचान या क्षेत्रीय मैपिंग स्पष्ट नहीं होती। ऐसे नाम न केवल चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि फर्जीवाड़े की आशंका को भी जन्म देते हैं। इसी कारण निर्वाचन आयोग ने इस श्रेणी को विशेष निगरानी में रखा है।

‘नो एंट्री फॉर फर्जी, नो एक्सक्लूजन ऑफ जेनुइन’ का संदेश

निरीक्षण के दौरान वान्या सिंह ने अधिकारियों को दो टूक निर्देश दिए—

  • कोई अपात्र व्यक्ति अनधिकृत रूप से मतदाता सूची में शामिल न हो।
  • कोई पात्र मतदाता सिर्फ लापरवाही या प्रक्रिया की जटिलता के कारण वंचित न रहे।

यह संदेश साफ करता है कि प्रशासन की प्राथमिकता संतुलन पर है—सख्ती भी और संवेदनशीलता भी।

6 फरवरी तक दावे-आपत्तियों की डेडलाइन, दबाव में अमला

निर्वाचन आयोग द्वारा दावे और आपत्तियां दर्ज करने की अंतिम तिथि 6 फरवरी 2026 तय की गई है। इसी क्रम में 15 जनवरी को जारी नोटिसों पर ईआरओ, एईआरओ और अतिरिक्त एईआरओ द्वारा सुनवाई की जा रही है।
प्रति निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कम से कम 150 मामलों की सुनवाई का निर्देश यह संकेत देता है कि प्रशासन समयसीमा को लेकर गंभीर है, लेकिन साथ ही यह भी सवाल उठता है कि—

क्या इतनी बड़ी संख्या में सुनवाई गुणवत्ता से समझौता किए बिना संभव है?

दस्तावेज़ ही निर्णायक, मौखिक दावे नहीं

सुनवाई के दौरान आयोग के निर्देशानुसार आवश्यक दस्तावेजों के आधार पर ही नाम जोड़ने या संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। यह व्यवस्था मनमानी और दबाव की राजनीति पर अंकुश लगाने का प्रयास मानी जा रही है।

बड़ा सवाल: सिर्फ प्रक्रिया या लोकतंत्र की सफाई?

नहटौर में चल रही यह कवायद आने वाले चुनावों से पहले मतदाता सूची को ‘क्लीन और क्रेडिबल’ बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है। अगर यह मॉडल ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ लागू होता है, तो यह अन्य विधानसभा क्षेत्रों के लिए भी रोल मॉडल बन सकता है।

लेकिन निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि—

  • क्या जमीनी स्तर पर निर्देशों का अक्षरशः पालन होगा?
  • या फिर यह कवायद फाइलों तक सीमित रह जाएगी?

फैसला आने वाले दिनों में दिखेगा, लेकिन इतना तय है कि नहटौर में मतदाता सूची इस वक्त प्रशासनिक कसौटी पर है।

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