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गजरौला में ‘विकास’ बना ज़हर: बीमार बच्चे, दबाए गए मौतों के आंकड़े

गजरौला में ‘विकास’ बना ज़हर: बीमार बच्चे, दबाए गए मौतों के आंकड़े और 21वें दिन भी जारी किसानों का बेमियादी आंदोलन

नाईपुरा गांव से उठी दूषित पानी की त्रासदी, स्कूल के बच्चों से लेकर खेतों तक असर; भाकियू ने सरकार–उद्योग–प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया
विश्लेषणात्मक रिपोर्ट | डिजिटल न्यूज पोर्टल

गजरौला/अमरोहा | 10 जनवरी 2026

उत्तर प्रदेश के औद्योगिक नक्शे पर चमकता दिखने वाला गजरौला आज ज़मीनी हकीकत में प्रदूषण की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। यहां विकास के दावों के बीच ज़हरीला पानी, बीमार बच्चे, सूखती खेती और छुपाए जा रहे आंकड़े एक भयावह सच्चाई बनकर सामने आए हैं। ताजा मामला नाईपुरा गांव स्थित न्यू स्कालर पब्लिक स्कूल से जुड़ा है, जहां बच्चों ने दूषित पानी पीने से बीमार होने की शिकायत की है।

स्कूल प्रबंधन से जुड़े एहसान अली ने पुष्टि करते हुए कहा कि

“यह समस्या केवल स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा नाईपुरा गांव दूषित जल जनित बीमारियों की चपेट में है।”

बीमार बच्चे, लेकिन सिस्टम खामोश

स्थानीय लोगों का आरोप है कि दूषित भूजल के कारण पेट, त्वचा और श्वसन संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन इन्हें जानबूझकर मामूली बताया जा रहा है। इससे भी गंभीर आरोप यह है कि पिछले वर्षों में हुई मौतों के आंकड़े दबाए गए, ताकि प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर आंच न आए।

75 साल बाद भी शुद्ध पानी क्यों नहीं?

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा—

“आजादी के 75 साल बाद भी गजरौला के लोगों को शुद्ध पीने का पानी नहीं मिल पाया। स्वच्छ भारत अभियान और हर घर नल से जल योजना पर हजारों करोड़ खर्च हुए, फिर भी लोग बदबूदार और पीला पानी पीने को मजबूर हैं।”

उन्होंने आरोप लगाया कि तंत्र आंकड़ों की बाजीगरी में लगा है और बीमारी के लिए दूषित पानी के बजाय मिलावटी खान-पान को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

21वें दिन भी जारी बेमियादी धरना

औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ भाकियू संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में किसानों का बेमियादी धरना 21वें दिन भी जारी रहा। शनिवार को सबसे अधिक प्रभावित नाईपुरा गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में धरना स्थल पहुंचे और आंदोलन को समर्थन दिया।

धरनास्थल पर किसानों और ग्रामीणों का साफ कहना है—
“अब यह लड़ाई पानी, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों की है।”

भूजल ज़हरीला, नदियां मृतप्राय

गजरौला के औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट सीधे भूजल में मिल रहा है

  • पानी पीला और बदबूदार हो चुका है
  • भूमिगत जलस्तर लगातार गिर रहा है
  • बगद जैसी सहायक नदियां प्रदूषण की भेंट चढ़ चुकी हैं
  • कुएं, तालाब और पुराने जलस्रोत अनुपयोगी
  • ग्राउंडवॉटर रिचार्ज की प्राकृतिक प्रक्रिया ठप

स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. गौतम लंबरदार ने चेतावनी देते हुए कहा—

“प्रदूषण के महीन कणों से महिलाओं में कमजोरी बढ़ रही है, जिसके चलते कमजोर और कुपोषित बच्चों का जन्म हो रहा है। यह आने वाले समय के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।”

एकतरफा विकास, कीमत जनता क्यों चुकाए?

प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने कहा कि जहां एक ओर स्थानीय लोगों की आमदनी घट रही है, वहीं कुछ रासायनिक कारखानों के प्रबंधन तंत्र की संपत्ति लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने मांग की कि

“इस पूरे मामले की जांच ईडी जैसी एजेंसियों से कराई जाए, ताकि स्पष्ट हो सके कि विकास का लाभ किसे और नुकसान कौन झेल रहा है।”

पहले भी लगे थे प्रतिबंध, फिर क्यों ढिलाई?

यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एनजीटी द्वारा कार्रवाई के आदेश दिए जा चुके हैं।
बैस्ट क्राप (पूर्व में कैमचूरा) फैक्ट्री से गैस लीक की घटनाओं के बाद यूनिट बंद कराई गई थी, लेकिन कुछ समय बाद दोबारा संचालन शुरू हो गया, जिससे प्रशासनिक मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

ग्रामीणों और किसानों की स्पष्ट मांगें

✔️ भूजल प्रदूषण की तत्काल उच्चस्तरीय जांच
✔️ प्रभावित इलाकों में शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था
✔️ दोषी कारखानों पर कड़ी कार्रवाई व पर्यावरण क्षतिपूर्ति
✔️ प्रदूषण से नष्ट फसलों का उचित मुआवजा

किसानों ने चेतावनी दी है कि जब तक ठोस और लिखित कार्रवाई नहीं होती, आंदोलन और तेज होगा।

गजरौला की यह तस्वीर सिर्फ एक औद्योगिक कस्बे की कहानी नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल पर सवाल है जिसमें मुनाफा तो बढ़ता है, लेकिन जनता की सेहत और पर्यावरण की कीमत पर। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठे, तो यह संकट आने वाले वर्षों में मानवीय आपदा का रूप ले सकता है।

Note: ( किसान संगठन द्वारा लगाए गए, आरोपों की target tv live किसी भी रूप में पुष्टि नहीं करता है)

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