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हिमालय की पुकार: सोनम वांगचुक की रिहाई को लेकर कोटद्वार से उठा जन-आंदोलन

🔴 90 दिन हिरासत, सवालों के घेरे में लोकतंत्र

हिमालय की पुकार: सोनम वांगचुक की रिहाई को लेकर कोटद्वार से उठा जन-आंदोलन

कोटद्वार | विशेष रिपोर्ट
हिमालय के अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई में एक बड़ा सवाल अब देश की लोकतांत्रिक चेतना के सामने खड़ा है—क्या “विकास” की आड़ में प्रकृति और असहमति की आवाज़ को दबाया जा रहा है? देश के जाने-माने पर्यावरणविद और हिमालय के प्रखर प्रहरी सोनम वांगचुक की हिरासत को 90 दिन पूरे होने पर यह सवाल और तीखा हो गया है।

इसी पृष्ठभूमि में कोटद्वार के तीलू रौतेली चौक पर शुक्रवार को एक व्यापक जन-जागरूकता अभियान देखने को मिला। समाजसेवी व एक्टिविस्ट मुकेश सेमवाल के नेतृत्व में आयोजित इस अभियान में बड़ी संख्या में नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों और युवाओं ने भाग लिया। अभियान के बाद तहसील पहुँचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम ज्ञापन भी सौंपा गया।

“सम्मानित व्यक्तित्व का अनादर क्यों?”

जन-आक्रोश और जन-जागरण की आवाज़

इस अभियान का केंद्र केवल सोनम वांगचुक की रिहाई नहीं था, बल्कि उत्तराखंड में तेज़ी से हो रहे पर्यावरणीय ह्रास को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई।
जन चेतना, जन जागरूकता और जन सहभागिता”—इन नारों के साथ प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि

रेमन मैग्सेसे जैसे 15 से अधिक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित व्यक्ति को बिना किसी आरोप के रासुका के तहत नजरबंद रखना आखिर किस लोकतांत्रिक मूल्य का प्रतीक है?

अभियान का नेतृत्व कर रहे मुकेश सेमवाल ने कहा—

“सोनम वांगचुक ने अपना पूरा जीवन देश की सेना, सीमावर्ती क्षेत्रों और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी न केवल अनुचित है, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा पर भी प्रहार है।”

विकास या विनाश?

उत्तराखंड के अस्तित्व पर मंडराता खतरा

समाजसेवी मुजीब नैथानी ने उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि
उत्तराखंड की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता और हिमालयी पारिस्थितिकी से है, लेकिन पौड़ी से लेकर गंगोत्री तक जिस तरह से पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है, वह आने वाले समय में राज्य के अस्तित्व के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।

बदलता मौसम—खतरे की घंटी

वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु थपलियाल ने जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा—

  • सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हजारों पेड़ों की बलि हिमालयी इकोसिस्टम को असंतुलित कर रही है।
  • प्राकृतिक आपदाएँ अब अपवाद नहीं, बल्कि पर्यावरण से छेड़छाड़ का सीधा परिणाम बनती जा रही हैं।
  • बर्फबारी का अभाव—दिसंबर समाप्ति पर भी पहाड़ों में बर्फ न गिरना, मानवीय हस्तक्षेप का स्पष्ट संकेत है।

जन-आंदोलन में बदलती मांग

इस सार्वजनिक अभियान ने साफ कर दिया कि सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही।
अनिकेत ने कहा—

“सोनम वांगचुक पूरे हिमालय क्षेत्र के प्रतिनिधि, संरक्षक और दूत हैं। बिना किसी चार्ज के 90 दिनों से अधिक समय तक रासुका के तहत नजरबंद रखना संवैधानिक मूल्यों की हत्या है। अब यह लड़ाई पूरे समाज की है।”

ग्रीन आर्मी की सक्रिय भागीदारी

इस जन-जागरूकता अभियान में ग्रीन आर्मी के सदस्यों की भी प्रभावशाली भागीदारी रही।
संस्था के अध्यक्ष शिवम नेगी, महासचिव उत्कर्ष नेगी, स्वयंसेवक ज्योति सजवान, सतेंद्र, विनय, अनुज और अनिकेत नौटियाल सहित अनेक युवाओं ने एक स्वर में चेताया—

“अगर आज नहीं चेते, तो आने वाला समय उत्तराखंड की भावी पीढ़ियों के लिए आत्मघाती होगा।”

विश्लेषण

कोटद्वार में उठी यह आवाज़ केवल एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि हिमालय, पर्यावरण और लोकतंत्र को बचाने की सामूहिक पुकार है।
सोनम वांगचुक की हिरासत ने यह बहस तेज़ कर दी है कि क्या असहमति और पर्यावरण संरक्षण की आवाज़ें अब सत्ता को असहज करने लगी हैं?
इतिहास गवाह है—जो विकास प्रकृति की कीमत पर होता है, वह कभी टिकाऊ नहीं होता।

अब सवाल सरकार से है—
क्या वह इस जन-आंदोलन की गूंज सुनेगी, या हिमालय की यह चेतावनी भी अनसुनी रह जाएगी?

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