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रोबोडॉग विवाद ने खोली पोल! डिग्री की फैक्ट्री बनते भारतीय विश्वविद्यालय, गुणवत्ता क्यों हो रही गायब?

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विशेष लेख | डॉ. प्रियंका सौरभ

रोबोडॉग से उठे सवाल, लेकिन संकट कहीं ज्यादा गहरा

हाल ही में गलगोटिया यूनिवर्सिटी में रोबोडॉग के प्रदर्शन को लेकर उठा विवाद सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा मीडिया तक चर्चा का विषय बना। पहली नजर में यह मामला कैंपस संस्कृति या प्राथमिकताओं का लग सकता है, लेकिन यह विवाद भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से पनप रहे एक गहरे संकट का प्रतीक है।

सच यह है कि समस्या रोबोडॉग नहीं है, बल्कि वह शिक्षा प्रणाली है, जो धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है।

तेजी से बढ़े विश्वविद्यालय, लेकिन गिर गई गुणवत्ता

पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। निजी विश्वविद्यालयों और स्ववित्तपोषित कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी। इसे शिक्षा तक पहुंच बढ़ने का संकेत बताया गया, लेकिन इस विस्तार के साथ अकादमिक गुणवत्ता और नियमन मजबूत नहीं हो पाए।

परिणाम यह हुआ कि:

  • विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी
  • लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता घटती गई
  • डिग्री का मूल्य कम होने लगा

आज कई संस्थान शिक्षा के केंद्र कम और “डिग्री वितरण केंद्र” अधिक बन गए हैं।

डिग्री मिल रही, लेकिन कौशल नहीं

स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक विज्ञान और व्यावसायिक विषयों में है।

आज बड़ी संख्या में छात्र:

  • बिना नियमित कक्षाओं के डिग्री ले रहे हैं
  • बिना प्रयोगशाला प्रशिक्षण के विज्ञान स्नातक बन रहे हैं
  • बिना व्यावहारिक ज्ञान के प्रोफेशनल डिग्री हासिल कर रहे हैं

परिणामस्वरूप, जब ये छात्र नौकरी के लिए जाते हैं तो बुनियादी ज्ञान की कमी सामने आ जाती है।

उदाहरण के तौर पर:

  • केमिस्ट्री पोस्टग्रेजुएट बेसिक कॉन्सेप्ट नहीं समझ पाता
  • कॉमर्स ग्रेजुएट डेबिट-क्रेडिट नहीं बता पाता
  • MBA छात्र समस्या समाधान में कमजोर होता है

शिक्षित बेरोजगारी का असली कारण यही है

अक्सर बेरोजगारी के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन एक असहज सच्चाई यह भी है कि बड़ी संख्या में छात्र रोजगार-योग्य ही नहीं हैं।

यही कारण है कि:

  • कंपनियां नए कर्मचारियों को दोबारा ट्रेन करती हैं
  • उद्योग योग्य उम्मीदवारों की कमी की शिकायत करते हैं
  • युवा डिग्री के बावजूद बेरोजगार रह जाते हैं

नियामक प्रणाली भी बन गई औपचारिकता

भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कई नियामक संस्थाएं हैं, लेकिन व्यवहार में उनकी भूमिका अक्सर औपचारिक बनकर रह जाती है।

मुख्य समस्याएं:

  • निरीक्षण पहले से तय होते हैं
  • दस्तावेज सजाकर दिखाए जाते हैं
  • इमारतों पर ध्यान, शिक्षा पर नहीं
  • सीखने के परिणामों की निगरानी नहीं

इससे संस्थान सुधार करने के बजाय “सिस्टम मैनेज” करना सीख जाते हैं।

ईमानदार छात्रों के साथ सबसे बड़ा अन्याय

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों को होता है जो सच में सीखना चाहते हैं।

ऐसे छात्र:

  • औसत संस्थानों में फंस जाते हैं
  • उनकी प्रतिभा दब जाती है
  • करियर प्रभावित होता है

यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिभा की बर्बादी है।

कुछ अच्छे संस्थान अपवाद हैं, लेकिन सिस्टम नहीं

भारत में आज भी कुछ उत्कृष्ट संस्थान हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करते हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है।

सच्चाई यह है कि:

विश्वविद्यालय तो बढ़े हैं, लेकिन शिक्षा नहीं।

अगर अब सुधार नहीं हुआ तो डिग्री का मूल्य खत्म हो जाएगा

यदि स्थिति नहीं बदली तो भविष्य में:

  • डिग्री का महत्व कम हो जाएगा
  • शिक्षा पर विश्वास घट जाएगा
  • योग्य और अयोग्य में फर्क खत्म हो जाएगा

अब क्या करना होगा? समाधान क्या है

सुधार के लिए जरूरी कदम:

✔️ नियामकों को पारदर्शी और सख्त मूल्यांकन करना होगा
✔️ खराब प्रदर्शन करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई करनी होगी
✔️ सीटें कम करनी होंगी या मान्यता रद्द करनी होगी
✔️ शिक्षा को व्यवसाय नहीं, जिम्मेदारी समझना होगा

छात्र और अभिभावकों को भी सतर्क रहना होगा

कॉलेज चुनते समय केवल इन बातों पर ध्यान न दें:

  • चमकदार कैंपस
  • विज्ञापन
  • ब्रांडिंग

बल्कि देखें:

  • शिक्षण गुणवत्ता
  • फैकल्टी
  • प्लेसमेंट
  • अकादमिक वातावरण

निष्कर्ष: शिक्षा का उद्देश्य डिग्री नहीं, क्षमता है

उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि सक्षम और जिम्मेदार नागरिक बनाना है।

जब तक यह उद्देश्य पुनः स्थापित नहीं होता, तब तक रोबोडॉग जैसे विवाद आते रहेंगे और असली संकट छिपा रहेगा।

(लेखिका शिक्षाविद और सामाजिक विश्लेषक हैं)

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